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मंदिरों-पंडालों में हुई कूष्मांडा की पूजा

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अयोध्या। शारदीय नवरात्र के चौथे दिन मंगलवार को चहुंओर कूष्मांडा माता के मंत्रोच्चार और जयकारे के स्वर गूंजते रहे। सिद्धपीठों के अलावा अन्य देवीय मंदिर ‘जय माता दी’ के जयघोष के साथ ही घंटे-घड़ियाल और तालियों की आवाजों से गूंजते रहे। पिछले चार दिनों से शहर भक्ति के रंग में रंगा हुआ है। मंदिरों में कोविड प्रोटोकाल का पालन किया जा रहा है।
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नगर में बड़ी देवकाली, जालपा देवी, गुप्तारघाट में मणि माता मंदिर, मकबरा के शीतला माता मंदिर, अयोध्या में प्रसिद्ध छोटी देवकाली मंदिर, चौक में हट्ठी महारानी मंदिर जैसी सिद्धपीठों में नवरात्र के प्रथम दिवस से ही शुरू पूजापाठ से चहल पहल बनी हुई है। कामाख्या मंदिर फतेहपुर कमासिन में दर्शन पूजन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। मां दुर्गा के विभिन्न अवतारों की दिन प्रतिदिन पूजा अर्चना कर मां के श्रद्धालु पुण्य लाभ कमा रहे है। वहीं अयोध्या की छोटी व फैजाबाद की बड़ी देवकाली मंदिर में दिन भर भक्तों का तांता लगा रहता है।
वहीं शहर के सभी मंदिरों में कोविड प्रोटोकाल का पालन किया जा रहा है। बिना मस्क लगाकर आने वाले श्रद्धालुओं को मास्क पहनने के बाद ही दर्शन की अनुमति दी जा रही है। गर्भगृह तक पांच-पांच की संख्या में श्रद्धालुओं को प्रवेश दिया जा रहा है। वहीं, सुरक्षा को लेकर सभी देवी मंदिरों पर पुलिस व महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है। सीओ सिटी निपुण अग्रवाल ने बताया कि पुलिस व प्रशासन के अधिकारी प्रतिदिन मंदिरों की व्यवस्थाओं का निरीक्षण कर रहे हैं।
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अयोध्या। कैंट क्षेत्र में कनौसा स्कूल के ठीक पीछे स्थित ऐतिहासिक सिद्धपीठ पाटेश्वरी मंदिर का निर्माण राजा उज्जैन के धन से हुआ था। करीब चार सौ साल पहले मंदिर बनाने के लिए धन देने वाले राजा का नाम, निर्माण तिथि और समय किसी को नहीं पता। निर्माण किसी विशिष्ट शैली में नहीं, लेकिन समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार सरकार और भक्तों की ओर से होने के कारण आज मंदिर भव्य स्वरूप ले चुका है।
पाटेश्वरी मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मां की मूर्ति के अलावा इससे हटकर परिसर में ही हनुमान जी, शंकर जी और साईंबाबा की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। मुख्य मंदिर में शिवसागर है, जिसका जल लोग आज भी प्रसाद के रूप में लेते हैं।
इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि उज्जैन के राजा अपने पुत्र और पत्नी के साथ अयोध्या पुण्य कमाने आये थे। उनके पुत्र की तबीयत ज्यादा खराब थी। वापस जाते समय उनके बेटे की इसी स्थान पर मौत हो गयी थी। उन दिनों यहां एक छोटा सा तालाब और मठिया थी। शाम के समय नीम के नीचे राजा बच्चे को लिटाकर विलाप कर रहे थे।
अचानक एक बुढ़िया आई और बोली मठिया में बने शिवसागर का थोड़ा जल बच्चे को पिला और कुछ माथे पर लगा दे। कहते हैं बुढ़िया ने बच्चे के ठीक होने पर राजा से यहां मंदिर और कुंड निर्माण कराने का वचन लिया था। इसके बाद बुढ़िया लापता हो गयी। राजा का बेटा थोड़ी देर बाद जी उठा और चंगा हो गया।
उन्होंने बाद में मंदिर और कुंड निर्माण के लिए धन दिया। देखरेख का भार गौरापट्टी के डॉ. मथुरा प्रसाद चौबे को मिला, बाद में उन्होंने इसे बालकराम कालोनी के राघवराम पांडेय को सौंप दिया। आज इसकी देखभाल ट्रस्ट के माध्यम से हो रही है। शारदीय और चैत्र की नवरात्र में सिद्धपीठ का महत्व खासा बढ़ जाता है। सामान्य दिनों में प्रतिप्रदा और अष्टमी को भक्त मां के दर्शन को पहुंचते हैं। मंदिर के बगल बने विशाल कुंड में गिरता मां का चरणोदक पीकर श्रद्धालु अपने को धन्य मानते हैं।
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