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नौ वर्षों की तपस्या के बाद ही बनते नागा

Fri, 18 Mar 2016 11:52 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/फैजाबाद
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हरद्वारी पट्टी की शोभायात्रा में शामिल साधु-संत। - फोटो : अमर उजाला
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अखिल भारतीय श्रीपंच रामानंदीय निर्वाणी अखाड़ा की मुख्यपीठ हनुमानगढ़ी में 12 वर्षों के अंतराल पर आयोजित होने वाले नागापनी महोत्सव में नागा बनने की राह आसान नहीं है। नौ वर्षों की कठिन तपस्या के बाद ही साधु को नागा दीक्षा और उपाधि प्राप्त होती है।
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अखाड़े से जुड़े साधु ‘छोरा, बंदगीदार व मुरेठिया’ बनने के बाद ही नागातीत की श्रेणी में शामिल होते हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष व हनुमानगढ़ी सागरिया पट्टी के महंत ज्ञानदास व उज्जैनिया पट्टी के महंत संतराम दास बताते हैं कि चार श्रेणी के साधु 12 वर्षों में नागा उपाधि से दीक्षित किए जाते हैं।

अखाड़े से जुड़े साधु को नागा बनाए जाने में उम्र की बाध्यता नहीं होती। बताते हैं कि अखाड़े से जुड़े नागातीत गुरु के शिष्य रूप में भर्ती हो प्रथम तीन वर्षों का कार्यकाल पूरा करने वाले साधु को ‘छोरा’ कहा जाता है। तीन वर्षों के बाद छह वर्षों तक के कार्यकाल के साधु को ‘बंदिगीदार’ नाम दिया जाता है।
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इसके बाद ‘बंदिगीदार’ साधु को हनुमानगढ़ी मंदिर की पवित्र छड़ी उठाने का अधिकार भी प्राप्त हो जाता है। सात से नौ वर्षों के कार्यकाल के साधु को ‘मुरेठिया’ कहा जाता है। इन ‘मुरेठिया’ साधुओं को हनुमानगढ़ी मंदिर के पवित्र निशान उठाने का अधिकार प्रदान किया जाता है।

अखाड़े के नागातीत गुरुओं के शिष्यत्व में नौ वर्षों का कार्यकाल पूरा कर लेने वाले साधु नागा बनने के योग्य हो जाते हैं। 12 वर्षों के बाद आयोजित होने वाले नागापनी महोत्सव में समारोहपूर्वक साधुओं को नागा दीक्षा देकर उपाधि प्रदान की जाती है। इसके बाद यह अखाड़े के विशेष नागातीत की श्रेणी में शामिल हो जाते हैं।
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