फैजाबाद। ‘केरवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़ाराय...कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए...’ इस लोकगीत को सुनते ही छठ पर्व की यादें ताजा होने लगती है। नहाय-खाय के साथ शुरू होने वाला यह पर्व सोमवार से चार दिनों तक चलेगा। मूल रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाने वाला यह पर्व रामनगरी में भी अब वृहद रूप से मनाया जाने लगा है। बताते हैं कि अयोध्या का बिहार से गहरा नाता है, माता जानकी मिथिला की थीं, उसका प्रभाव यहां अच्छी-खासी बिहार की आबादी के रूप में दिखता है। तमाम बुजुर्ग बिहार छोड़ अपने परिवारीजनों समेत यहां बसे हुए हैं। वे बताते हैं कि करीब तीन हजार की आबादी सरयू घाटों से लेकर सूरजकुंड में छठ महापर्व मनाती है।
सूर्य की उपासना के महापर्व ‘डाला छठ’ की रौनक सोमवार से नजर आएगी। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होगी। खरना (छोटी छठ) मंगलवार को मनाई जाएगी। 29 अक्तूबर को महिलाएं निर्जला व्रत रखकर पुत्र प्राप्ति और पति की दीर्घायु के लिए डूबते सूरज को अर्घ्य देकर मंगलकामना करेंगी। अगले दिन बृहस्पतिवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करेंगी। छठ उत्सव को लेकर अयोध्या के संत तुलसी दास घाट व अन्य घाटों के साथ ही फैजाबाद में गुप्तारघाट पर मेले जैसा माहौल रहेगा। चार दिनी पर्व को लेकर उत्साह अभी से चरम पर है, बाजार में फलों व पूजा सामग्री की दुकानें सजनी शुरू हो गई हैं। सरयू अवध बालक समाज की ओर से छठ उत्सव की तैयारी भी तेज हो गई है। समाज की ओर से सूर्यास्त षष्ठी की महाआरती के साथ सूर्य नारायण भगवान की आकर्षक झांकी सजाई जाती है। समाज से जुड़े लोग बताते हैं कि छठ पर्व केवल पूजा-अर्चना ही नहीं है, बल्कि यह पूर्वांचल वासियों की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत है।
छठ के दौरान व्रती महिलाओं की ओर से भगवान सूर्य और उनकी बहन छठी के लिए भक्ति भाव से गाए गीतों में उनके समर्पण को सहज ही महसूस किया जा सकता है। सूर्य उपासना का महापर्व छठ मुख्य रूप से पति और पुत्र की लंबी उम्र के साथ-साथ सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है।