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चायनीज झालरों को चुनौती देंगे दीये

Tue, 21 Oct 2014 05:31 AM IST
Faizabad
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फैजाबाद। त्योहारों पर पुरानी परंपराओं का धीरे-धीरे ह्रास होता जा रहा है। दीपावली पर मिट्टी के दीये से दीपदान की परंपरा धूूमिल होती जा रही है। दीपों की जगह चायनीज झालरें व मोमबत्तियां ले रही हैं। आधुनिकता ने कुम्हारों के घरों की रोशनी छीन ली है। उनका रोजगार फीका होता जा रहा है। पहले दीपावली के दौरान गांवों में कोल्हू में तेल पेरने का व्यवसाय बढ़ जाता था, लेकिन जब दीये ही कम जलेंगे तो तेल की मांग भी घट ही जाएगी। बाजार की नब्ज टटोली गई तो पता चला कि इस बार स्वदेशी चीजें प्रयोग करने के लिए एसएमएस करके लोग एक-दूसरे को जागरूक कर रहे हैं। जिनमें चाइनीज झालरों की जगह दीये जलाने का संदेश दिया जा रहा है। इससे कुम्हारों को आशा है कि इस बार उनके दीये पिछले वर्ष के सापेक्ष ज्यादा बिकेंगे। ऐसे में उनकी अंगुलियां चाक पर तेजी से थिरक रही हैं। उम्मीद है कि इस बार चाइनीज झालरों को दीये चुनौती देंगे।
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कुम्हारों की बस्ती में छाई उदासी कम होती दिख रही है। उन्हें भरोसा है कि दीपावली पर उनके दीये व अन्य चीजों की भारी मांग होगी। मिट्टी के दीये व अन्य चीजों को बनाने के लिए चाक पर इन दिनों कुम्हारों की उंगलियां तेजी से थिरकने लगी है। इसके पीछे पिछले कुछ दिनों से अभियान के रूप में चल रहे उन एसएमएस का कम योगदान नहीं है जिनमें चाइनीज झालरों के बजाय दीये का प्रयोग करने का पैगाम प्रसारित हो रहा है।
दीपों के उत्सव में पिछले कुछ वर्षों से चाइनीज झालरों का दबदबा कायम है जिसके कारण कुम्हारों की हाथों की कलात्मक प्रतिभा से बने माटी के उत्पादाें की मांग कम हो गई। कुम्हारों की आर्थिक सेहत पर चाइनीज उत्पादों के आने के कारण बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा। इस बार चाइनीज झालरों को दीये से चुनौती मिलने के आसार नजर आ रहे हैं। शहर के कुम्हारन टोला में डेढ़ दर्जन परिवार दीया, कोसा, घड़ा, गगरी आदि बना रहे हैं। राधेश्याम, बृजेश प्रजापति, राम टहल, रामवीर, रामलखन, रामसरन आदि इन दिनों दिन-रात चाक चला रहे हैं।
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