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ब्रह्म मुहूर्त में शिखर पर पहुंची परिक्रमा

Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
Faizabad
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अयोध्या। शुक्रवार के अपराह्न 11:56 बजे शुरू हुई पंचकोसी परिक्रमा शनिवार ब्रह्म मुहूर्त में अपने शिखर पर पहुंची। दूर दराज से आए हजारों श्रद्धालुओं ने परिक्रमा में भाग लेकर अपनी आस्था का इजहार किया। भोर के कुछ घंटे तक तो परिक्रमा मार्ग पर तिल रखने तक की जगह नहीं थी। इस दौरान उमड़े श्रद्धालुओं के सैलाब ने सरयू में डुबकी लगा पुण्य प्राप्त किया। अपने आराध्य श्रीराम की भूमि की परिक्रमा करने के आगे दिक्कतें बौनी सिद्ध हो रही थीं। किसी को न भीड़ के दबाव की परवाह थी न ठंड की। कई तो ऐसे रहे जिन्होंने परिक्रमा शुरू कराने के पूर्व पावन सलिला में डुबकी लगाई। ऐसा करने वालों में महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग, युवा आदि सभी वर्गों के श्रद्धालु रहे। सूर्योदय होते-होते परिक्रमा पथ पर भक्तों का मेला लग चुका था। बीएससी के छात्र प्रवीण सिंह ने चार बजे रामघाट चौराहे से परिक्रमा शुरू की थी और सात बजते-बजते वे गंतव्य से बमुश्किल 1.5 किलोमीटर पीछे नयाघाट बंधा तिराहे पर पहुंच चुके थे। विज्ञान के छात्र का इस पारंपरिक अनुष्ठान से क्या वास्ता? इस सवाल पर वे तपाक से प्रतिप्रश्न करते हैं, जो भगवान उन्हें नियंत्रित कर रहा है, उस सुपर नेचुरल पावर को सहेजने का कोई मौका क्यों छोड़ा जाए? ईश्वर को साधने की इस वैज्ञानिक विचार धारा से इतर पूरा परिक्रमा पथ परंपरा, भक्ति और लोक सरोकार का अपूर्व साक्षी बना रहा। यदि कुछ जत्थे इस अनुष्ठान के साथ पिकनिक का मजा लेते चल रहे थे, तो कई ऐसे थे जो पूरे अनुशासन से प्रतिबद्ध नजर आ रहे थे। ऐसों में कतिपय पूरी लय से राम धुन करते हुए आगे बढ़ रहे थेे। सिद्धार्थनगर से आए ईंट भट्ठा व्यवसायी हरिनाथ वर्मा कहते हैं, यह मौका मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के प्रति अटूट विश्वास प्रकट करने का है। मुंगेर से आईं अवकाश प्राप्त शिक्षिका यशोदा के लिए तो यह मौका किसी नवजीवन से कम नहीं। एक दशक पूर्व पति के निधन से तो जैसे उनकी दुनिया खत्म हो गई थी, वह तो परिक्रमा सहित कई मौके पर रामनगरी आने के क्रम ने उन्हें जीने की नई दृष्टि दी। यह मौका, कारोबारियों के लिए भी बेहतर रहा। बंधा तिराहा से लेकर पूरे परिक्रमा मार्ग पर जगह-जगह तनी अस्थाई दुकानें बता रही थीं कि आस्था के इस सैलाब से कितनों की रोजी-रोटी मिलती होगी। रामअजोर मौर्य मूलत: छोटे किसान हैं पर अपने गांव से गुजरती 14 कोसी व पंचकोसी परिक्रमा के मौके पर चाय-पान की दुकान लगाकर वे प्रत्येक वर्ष छोटी पूंजी तैयार कर लेते हैं। गन्ना किसानों के लिए भी यह मौका मुफीद रहा। रिवाज के तौर पर देवोत्थानी एकादशी के दिन गन्ने की खरीददारी भी जमकर हुई। ऋणमोचनघाट से नयाघाट तक परिक्रमा मार्ग के समानांतर सरयू का सानिध्य श्रद्धालुओं को आस्था के साथ प्राकृतिक वैभव से भी परिचित कराने वाला बना।
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