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राग-वैराग्य को सुर-संगीत में पिरोता रामनगरी का सावन

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फैजाबाद। आनंद की अनुभूति व रिमझिम फुहारों का सावन महीना 28 जुलाई से शुरू हो रहा है। इस माह रामनगरी के विभिन्न मंदिरों में आराध्य के साथ झूलनोत्सव का राग-वैराग्य को सुर व संगीत में पिरोने का अलौकिक दृश्य उमग उठता है। वानप्रस्थ, गृहस्थ व संन्यासी इसे अलग-अलग ढंग से मनाते हैं। सब का लक्ष्य पालन में मिले आनंद को ग्रहण करना है। धार्मिक दृष्टि से अयोध्या का सावन अपने आप में खास है। यहां विभिन्न मंदिरों में भगवान श्रीराम को झूले में झुलाने की परंपरा है। साधु-संन्यासियों की मानें तो यह त्रेता युग से चली आ रही परंपरा है।
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नागेश्वर नाथ मंदिर के पुजारी जनार्दन प्रसाद बताते हैं कि तुलसीदास की रामायण में स्पष्ट लिखा है कि शिव द्रोही मम दास पियारा...। साथ ही सावन के संबंध में महाराज दशरथ व कुश की ओर से स्थापित शिवलिंग आज भी श्रद्धा के दरबार के रूप में जाना जाता है। अयोध्या में सावन की शुरुआत के साथ मठ-मदिंरों में भगवान श्रीराम के झूलनोत्सव की परंपरा काफी पुरानी है।

खास तौर पर रसिकाचार्यों, संन्यासियों व साधु-संतों की टोली में अपने आराध्य देव को रिझाने के लिए कजरी और भजनों के अलग-अलग रूप दिखते हैं। सावन में आराध्य को झूले में झुलाने के साथ विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों के साथ गीतों को गाने की परंपरा है। इसमें भगवान श्रीराम के विभिन्न स्वरूपों में देखा जाता है।
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कोई भगवान के रूप में तो कोई महाराज बहुत से साधु संत पिता व संतान के रूप में पूजते हैं। इसमें रिझाने के साथ उलाहना की भी बात होती है। गीत गायन के लिए विभिन्न मठ-मंदिरों में रियाज सहित भगवान श्रीराम को रिझाने के लिए गीतों की किताब लिखी गई है।

विशेष तौर पर रामवल्लभाकुंज, कनक भवन, लक्ष्मण किला, विहौती भवन, गोला घाट सद्गुरु शरण मंदिर व मणि पर्वत सहित विभिन्न मंदिरों में झूलनोत्सव होता है। इसमें फूल-बंगले की झांकियां भी सजती हैं। अधिकांश मंदिरों में गुरु पूर्णिमा से लेकर तीज तक होता है। तीज के दिन सभी मठ-मंदिर अपने झांकियों को लेकर मणि पर्वत पर जाते हैं। यहीं पर झूलनोत्सव का प्रमुख उत्सव होता है।

गोलाघाट स्थित सदगुरुशरण मंदिर के मंहत सिया किशोरीशरण दास बताते हैं कि मणि पर्वत की झूलनोत्सव परंपरा अति प्राचीन है। ऐसी मान्यता है कि मान्यता है कि माता जानकी को भगवान श्रीराम ने यहां झूला झुलाया था। मणि पर्वत पर माता जानकी की क्रीड़ाएं भी करने की पौराणिक कथाएं मिलती हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां मुरादें भी पूरी होती हैं।

सद्गुरु शरण मंदिर में एक माह चलता है झूलनोत्सव
अयोध्या में गोलाघाट पर स्थित सद्गुरु मंदिर में एक माह तक झूलनोत्सव का कार्यक्रम होता है। यहां भगवान के बाल्य रूप को प्रतिबिंब स्वरूप एक माह तक झुलाते है। इस दौरान संत-साधु भगवान के गीतों को संगीत की धुन में अपने आराध्य को रिझाते हैं। यहां पर आकाशवाणी व स्वरूप झांकी की परंपरा है। खास तौर पर छोटे बच्चों को भगवान का स्वरूप मानकर आकाशवाणी का कार्यक्रम कराया जाता है। इसमें मंदिर के नीचे खड़े लोग गीत-गायन करते हैं।

ग्रामीण अंचलों में सजती है लोक-संगीत की महफिल
साधु-संतों के सावन के ढंग के अलावा जिले ग्रामीण इलाकों में सुर संगीत की महफिल सजती है। परंपरा के अनुसार गांवों में झूले डाले जाते हैं। इसमें कजरी, मिर्जापुरी, बनारसी व अवधी लोकगीत गाए जाते हैं। हालांकि यह परंपरा अब समाप्ति की ओर है। लोकगीत से जुड़े जनौरा निवासी राजेश सिंह बताते हैं कि उनके बचपन में सावन के झूलों का काफी महत्व था।

यहां तक कि बहन-बेटियां अपनी ससुराल आ जाती थीं। इसमें हेंगा या सरावन को जूट की रस्सी से बांधकर नीम के पेड़ में झूला डाला जाता था। इसमें हंसी ठिठोलियों के साथ लोकगीत गाए जाते थे। वह बताते हैं कि परंपरा काफी हद तक समाप्त हुई है, लेकिन कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी जिंदा है।
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