फैजाबाद। सियासत नगर निगम चुनाव के पहले आरक्षण में उलझ गई है। वार्ड के बदले दायरे और प्रस्तावित आरक्षण ने दिग्गजों के माथे पर शिकन डाल दी है। मैदान में जाने के पहले संभावित उम्मीदवार लोगों को साधने का प्रयास कर रहे हैं। वे अपने वार्ड के साथ आसपास की सीटों पर भी नजर गड़ाए हैं।
अयोध्या व फैजाबाद नगर पालिकाओं को मिलाकर नगर निगम बना। फैजाबाद पालिका को एक यूूनिट मानकर 29 वार्डों में एससी, बीसी और महिलाओं के लिए आरक्षण होता था तो अयोध्या के 25 वार्डों में एसएसी, बीसी और महिलाओं के लिए आरक्षण किया जाता था।
फैजाबाद में 10 वार्ड तो अयोध्या में आठ वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। अयोध्या और फैजाबाद को मिलाकर बने नगर निगम को एक यूनिट मानकर आरक्षण किया जाएगा तो परिदृश्य पहले से बिल्कुल बदल जाएगा।
वार्डों की जनगणना बदलेगी, स्वाभाविक है कि इसके आधार पर आरक्षण से शहर के वार्डों से तस्वीर बदलेगी। पंचायत और निकायों में आरक्षण के लिए चक्रीय अनुक्रम लागू होने पर भी सियासी दिग्गज वार्डों के आरक्षण का आंकलन कर लेते थे, लेकिन निगम की 60 सीटों के लिए पहली बार होने वाले आरक्षण का आंकलन भी उनके लिए कठिन है।
ऐसे में वार्ड के परिसीमन के बाद प्रस्तावित आरक्षण ने पार्षद पद के उम्मीदवारों को उलझन में डाल दिया है। यहां किसी एक क्षेत्र की नहीं बल्कि पूरे निगम क्षेत्र में हालात ऐेसे ही हैं। निवर्तमान सभासद और निकाय चुनाव के सियासी दिग्गजों ने प्रचार का नया फंडा अपना लिया है।
वह अपने वार्ड के साथ जिन वार्डों पर समीकरण पक्ष में दिखाई पड़ रहा है इन सबको साधने का अचूक हथियार इस्तेमाल करने की रणनीति बनाने में जुटे हैं। दूसरी सीटें आरक्षण की फेहरिस्त में उनके वर्ग की महिला के लिए आरक्षित हुई तो वह पत्नी या किसी करीबी को मैदान में उतारकर निकाय की सियासत बनाए रखने की कोशिश में हैं।