अयोध्या। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के लिए अयोध्या की जमीन महाराष्ट्र के सियासत में ऊर्जा का स्रोत बन गई है। साढ़े छह माह बाद फिर इसी सियासत का पार्ट-2 शनिवार को शुरू हो गया है।
इस बार राम मंदिर के बहाने बेटे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने की रणनीति है। इसीलिए शिवसेना की भाषा ही नहीं, बल्कि भाव-भंगिमा भी बदली-बदली सी है।
पहले प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ मंदिर फिर सरकार का नारा देते हुए तल्ख शब्दबाण चलाए थे, अब उन्हीं के नेतृत्व में राममंदिर बनाने की बात करते हुए कहते हैं कि हमारे लिए सुप्रीम कोर्ट हैं।
अयोध्या विकास के मामले में भले ही दशकों से सिसक रही हो, मगर हिंदुत्ववादी पार्टियों के लिए राममंदिर हमेशा राजनीतिक फायदे का मुद्दा रहा है।
अयोध्या की जमीन से 204 दिन पहले 24 नवंबर को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मंच से 34 साल साथ रही भाजपा-आरएसएस पर खूब निशाना साधा था।
तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कहा था कि चार साल से सो रहे कुंभकर्ण को जगाने आया हूं। रामलला के चरणों में पहले मंदिर फिर सरकार का संकल्प भी दोहराया था।
इसके गवाह रहे रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सतेंद्र दास कहते हैं कि राम तो फिर छले गए। उद्धव ने वादा 2019 का किया था, अब वे 2024 चुनाव से पहले राममंदिर बन जाने की बात करते हैं।
साफ जाहिर है कि सरकार पर मंदिर बनाने का दबाव बनाना इनका उद्देश्य नहीं था, बल्कि महाराष्ट्र में फिर से बड़ा भाई बनने की सियासत थी। जिसमें 18 सीटें जीतकर वह सफल भी हुए। अब विधानसभा चुनाव सामने है तो अयोध्या आने का उद्देश्य उत्तर भारतीयों के सहारे ज्यादा सीट जीतना है।
अवध विवि के प्रो. अजय प्रताप सिंह कहते हैं कि ठाकरे 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा से अधिक सीटें जीतकर बेटे आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते हैं।
शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत कहते हैं कि आदित्य ठाकरे युवा हैं, प्रदेश के युवा उन्हें मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं। इसकी शुरूआत हो चुकी है, भाजपा से 144-144 सीटों पर मिलकर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को टक्कर देंगे।
पिछला वादा याद दिलाने पर सफाई देते हैं कि रामलला राजनीति का नहीं, आस्था का विषय हैं। राम के नाम पर वोट न पहले मांगा था, न कभी मांगेंगे।
उद्धव ठाकरे अयोध्या आकर अपना वादा निभा रहे हैं, वे रामलला से जल्द मंदिर निर्माण शुरू करने की प्रार्थना करेंगे। वे कहते हैं सभी मामला सुप्रीम कोर्ट से हल नहीं हो सकता, हमारे लिए राममंदिर बनवाने के लिए मोदी व अमित शाह ही सुप्रीम कोर्ट हैं। 2020 में राज्यसभा में बहुमत मिलते ही सब साफ हो जाएगा।
राम की याद के पीछे महाराष्ट्र की हार
जौनपुर के रहने वाले मुंबई हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता एके दूबे वहां विहिप के प्रभावी नेता हैं। वे 24 नवंबर को ठाकरे के साथ अयोध्या आए थे, कहते हैं कि अयोध्या का असर लोकसभा चुनाव में खूब दिखा।
शिवसेना अपने मंत्री अनंत गीते समेत चार प्रमुख सीटें हारने के बावजूद चार नई सीटें जीतने में कामयाब रही। इसकी राममंदिर मुद्दे पर ग्रामीण वोटों का तेजी से ध्रुवीकरण था।
इसी रणनीति को ठाकरे सांसदों के साथ अयोध्या जाकर और मजबूत करना चाहते हैं। वे दावे के साथ कहते हैं कि संजय राउत चाहे जो कहें, वे कुछ दिन पहले शिवसेना प्रमुख से मिले थे। ठाकरे परिवार न चुनाव लड़ेगा, न ही किसी पद की चाहत रखता है।
राममंदिर से प्रभावित होता है उत्तर भारतीयों का वोटबैंक
अयोध्या। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की 16 जून की अयोध्या यात्रा के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। हालांकि इसे पूरी तरह धार्मिक रूप देने की कोशिश हो रही है लेकिन वास्तव में इसके जरिए शिवसेना कहीं न कहीं मुंबई के ‘भइया’ यानि उत्तर भारतीय वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है।
उद्धव की पिछली अयोध्या यात्रा विहिप की धर्मसभा के ठीक एक दिन हुई थी तब राममंदिर आंदोलन का बिगुल फूंककर उन्होंने उत्तर भारतीयों का दिल जीत लिया।
मुंबई में पूर्वी यूपी के लोगों की बड़ी आबादी वहां के चुनाव को प्रभावित करती है इसकी तस्दीक लोकसभा चुनाव के पूर्व हुए मुंबई महानगर पालिका के चुनाव में भी हो चुकी है।
जहां 227 में से 150 सीटों पर उत्तर भारतीय निर्णायक भूमिका में रहे। इस बार उद्धव की यात्रा को इसी वर्ष होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
धार्मिक नहीं राजनीतिक है उद्धव की अयोध्या यात्रा
राममंदिर निर्माण के लिए आमरण अनशन कर चुके महंत परमहंस दास कहते हैं कि उद्धव की अयोध्या यात्रा और दर्शन-पूजन राजनीति से प्रेरित दिख रहा है। वह उत्तर भारतीयों में अपना वोटबैंक मजबूत करना चाहते हैं। इसीलिए अयोध्या मुद्दा गर्मा रहे हैं।
राजनीति का अखाड़ा न बने अयोध्या
अयोध्या मामले के मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी ने का कहना है कि अयोध्या को राजनीति का अखाड़ा न बनाएं। अयोध्या में दर्शन-पूजन की आड़ में नेता राजनीतिक रोटी सेंकते हैं। शिवसेना प्रमुख पहले भी अयोध्या मसले को तूल देने का प्रयास कर चुके हैं। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि अयोध्या में शांति कायम रहे।