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अधिग्रहण का दंश झेल रहे लोग, कई मंदिरों का वजूद समाप्त

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अधिग्रहण के चलते कई मंदिरों का वजूद खतरे में
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अयोध्या। केंद्र सरकार ने अयोध्या एक्ट बनाकर 67 एकड़ भूमि अधिग्रहीत कर ली, जिसके बाद यहां स्थित दर्जन भर पौराणिक मंदिरों में राग-भोग पूजा पाठ बंद हो गया। यही नहीं करीब आधा दर्जन मंदिरों का वजूद ही समाप्त हो गया।

जो बचे हैं वह वीरानी का दंश झेल रहे हैं। भक्तों से दूर हुए इन मंदिरों की माली हालत ऐसी बिगड़ी कि संत-महंतों के लिए पेट पालना मुश्किल हो गया और वह एक-एक कर पलायन कर गये। कई मंदिरों में अर्द्धसैनिक बल का डेरा जमाए हैं।
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वर्ष 1993 में केंद्र सरकार की ओर से लागू सरटेन एरिया एक्यूजिशन एक्ट को ही अयोध्या एक्ट कहा जाता है। इसके लागू होने से पहले रामकोट मोहल्ला रामनगरी की धार्मिक व आध्यात्मिकता का केंद्र था।

रामकोट में ही रामलला का विवादित गर्भगृह स्थित है। इस क्षेत्र में दर्जन भर ऐसे मंदिर थे जिनको लेकर कोई न कोई पौराणिक मान्यताएं जुड़ीं थीं और उनकी आध्यात्मिक आभा श्रद्धालुओं को बरबस ही खींच लेती थी।

अब हालत यह हैं कि रामकोट स्थित मानस भवन, रंगमहल, रामजन्म स्थान, राम खजाना, रामनिवास मंदिर, कैकेयी कोप भवन, सीता रसोई, लवकुश मंदिर, अमावां मंदिर, रामकृष्ण मंदिर, आनंद भवन, रंग जी का मंदिर वीरानी का दंश झेल रहे हैं।

इन मंदिरों तक इतनी बैरिकेडिंग है कि सामान्य दिनों में भी श्रद्धालु इधर का रुख नहीं करते। महंत रामदास बताते हैं कि 1991 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने भूमि को अधिग्रहीत की और रामजन्मभूमि न्यास को सुंदरीकरण के नाम पर लीज पर दे दी।

इसके विरोध में निर्मोही अखाड़ा ने याचिका डाली। 12 दिसंबर 1992 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार का अधिग्रहण निरस्त कर दिया। 1993 में भारत सरकार ने अयोध्या एक्ट बनाकर भूमि अधिग्रहीत कर ली। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने जायज ठहराया।

बताते हैं कि इस अधिग्रहण के चलते कई मंदिरों का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। सुमित्रा भवन, संकटमोचन मंदिर, सालिकराम मंदिर व कथा मंडप का वजूद समाप्त हो चुका है।

आनंद भवन के व्यवस्थापक रामनंदन शरण बताते हैं कि अधिग्रहण के बाद उन्होंने सुटहटी मोहल्ले में नया मंदिर बनाया है। अधिग्रहीत क्षेत्र में आज आनंद भवन मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, वहां पूजा-पाठ की अनुमति नहीं है।

अधिग्रहण से प्रभावित रंगजी मंदिर के व्यवस्थापक कर्मवीर सिंह बताते हैं कि अधिग्रहण से मंदिर का अस्तित्व समाप्त होने को है, मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो चुका है, वर्षों से पूजा-अर्चना नहीं हो रही है। फकीरे राममंदिर में अर्द्धसैनिक बल का कब्जा है।

यहां भी पूजा-पाठ प्रभावित है। रामलला मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास के अनुसार पूर्व में रामजन्मभूमि के अतिरिक्त शेषावतार मंदिर, सीता रसोई, साक्षी गोपाल व मानस भवन में विराजमान भगवान की पूजा-अर्चना के लिए निर्धारित व्यय उन्हें अधिग्रहीत परिसर के अधिकृत व्यक्ति/रिसीवर की ओर से प्राप्त होता था।
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1995 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला की आय किसी अन्य मंदिर पर खर्च करने पर एतराज जताया और लखनऊ पीठ में याचिका दायर कर दी।

इसके बाद हाईकोर्ट ने रिसीवर की ओर से दी जाने वाली धनराशि पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि रामलला के नाम की धनराशि अन्य मंदिर में नहीं लगाई जा सकती।

राम जानकी भवन, कोहबर भवन, राम खजाना, आनंद भवन, विश्वामित्र आश्रम में भोग राग व पूजा-अर्चना अधिग्रहण के बाद से ही बंद है।

इन मंदिरों में वर्षों से पूजा-अर्चना बंद
विश्वामित्र आश्रम, रामजन्मस्थान, साक्षी गोपाल, मानस भवन, राम खजाना, कोहबर भवन, आनंद भवन।
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