प्रभावी पश्चिमी विक्षोभ न होने से नहीं हो रही बारिश
फैजाबाद। इस बार मौसम की बेरुखी ने हर मोड़ पर किसानों के चेहरे पर शिकन लाने का काम किया है। शुरुआती दौर में देर से ठंड शुरू होने के बाद लंबे समय तक गलन व शीतलहर के बाद बरसात न होना इसकी वजह है। कृषि वैज्ञानिक इसे खेती-किसानी के लिए नुकसानदायक मान रहे हैं। उनका कहना है कि यदि शीघ्र ही बरसात नहीं हुई तो गेहूं के साथ दलहन और तिलहन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। गेहूं की पैदावार में करीब 15-20 प्रतिशत तक कमी भी आ सकती है। वहीं मौसम विभाग के अनुसार बरसात न होने का प्रमुख कारण पश्चिमी विक्षोभ का असरदार न होना है।
कुमारगंज के मौसम विभाग के अनुसार इन दिनों जम्मू-कश्मीर व उत्तरी पाकिस्तान के ऊपर बने पश्चिमी विक्षोभ के असर से ही बादल देखे जा रहे हैं, लेकिन विक्षोभ प्रभावशाली न होने से बरसात नहीं होगी। मौसम विभाग के अनुसार 9 फरवरी को हिमालयन क्षेत्र में ताजा पश्चिमी विक्षोभ बनेगा। जिसके असर से 11 फरवरी तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत सुल्तानपुर, रायबरेली, अमेठी में हल्की बरसात हो सकती है। माना जा रहा है कि यदि यह विक्षोभ असरदार रहा तो जिले में भी बूंदाबांदी हो सकती है, लेकिन अभी इसे स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है। इस तरह यदि दो-चार दिनों में बरसात हुई तो यह फसलों के लिए संजीवनी का कार्य करेगी।
इस बार मौसम का अंदाज बिल्कुल उम्मीद के विपरीत रहा है, जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। शुरुआती दौर में कड़ाके की ठंड न होने से फसलों की ग्रोथ पहले से ही प्रभावित हो चुकी है। जब ठंड बढ़ी तो लंबे समय तक गलन व शीतलहर का प्रकोप रहा। जिससे आलू में झुलसा रोग की संभावना बढ़ गई। कुछ इलाकों में पाला लगने से खेत में आलू में गलन शुरू हो गया। अब तीन माह तक बरसात न होने से गेहूं सहित सभी दलहनी, तिलहनी फसलों के उत्पादन में कमी आने की संभावना दिखने लगी है। सरसों में भी माहू का प्रकोप देखा जा रहा है। एनडी विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. मिथलेश पांडेय कहते हैं कि यदि शीघ्र ही बरसात नहीं हुई तो फसलों का उत्पादन काफी प्रभावित होगा। दो-तीन दिनों से आसमान में काले बादल दिखाई पड़ रहे हैं, लेकिन ये इतने असरदार नहीं साबित हो रहे हैं कि बरसात हो सके। कहा कि, गेहूं में समय-समय पर सिंचाई कर उसे कुछ हद तक बचाया जा सकता है, लेकिन अधिक समस्या चना, अरहर, मटर आदि के लिए है। इनमें हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है, अन्यथा फसल खराब होने की संभावना रहती है। मटर, चना, मसूर आदि के लिए बरसात ही रामबाण मानी जाती है। लेकिन दो वर्षों से दिसंबर व जनवरी माह में बरसात न होने से किसानों को निराशा हाथ लग रही है।
पिछले वर्षों में बरसात का हाल
बरसात (मिमी.)
वर्ष दिसंबर जनवरी
2012 0.0 64.6
2013 0.4 3.2
2014 19.1 64.3
2015 0.0 35.4
2016 0.0 0.0
2017 0.0 0.0
2018 0.1 0.0
इस बार क्षेत्रवार बोई गई फसलें
फसल बोआई (हे.)
गेहूं 109850
जौ 220
मक्का 68
चना 1605
मटर 2241
मसूर 3277
तोरई 4933
आलू 3850
सरसों 4351
अलसी 22
पश्चिमी विक्षोभ के असरदार न होने से बरसात नहीं हो पा रही है। असिंचित क्षेत्र की हर फसलों के लिए मौसम का यह रुख अच्छा नहीं है। हिमालय पर बनने वाले पश्चिमी विक्षोभ से 11 फरवरी तक बूंदाबांदी के कुछ संकेत मिल रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तो फसलों के लिए संजीवनी साबित होगा। -डॉ. पद्माकर त्रिपाठी, पूर्व विभागाध्यक्ष कृषि मौसम विभाग
मौसम का रुख न बदलना चिंता का विषय है। यदि शीघ्र बरसात नहीं होती तो किसान प्रत्येक 21 दिन पर गेहूं की नियमित सिंचाई व यूरिया का छिड़काव करें। इसके अलावा दलहन व तिलहनी फसलों में हल्की सिंचाई करते रहें। गेहूं में खर-पतवार की दवा कृषि रक्षा इकाइयों से लेकर छिड़काव करते रहें। बरसात न होना आम के बौर के लिए भी ठीक नहीं है। -बीके सिंह, जिला कृषि अधिकारी फैजाबाद