इटावा। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद उनकी विरासत बचाने की कवायद में सपा जुटी हुई है। वहीं भाजपा इस बार समाजवादी किले को ढहाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती। सपा की ओर से विरासत की जिम्मेदारी लेने के लिए कई कंधे हैं तो भाजपा भी ऐसे प्रत्याशी को उतारने की तैयारी में है जो सपा कुनबे का करीबी रहा हो।
10 अक्तूबर को मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद उनकी पारंपरिक मैनपुरी सीट खाली हो गई थी। इस पर उपचुनाव की घोषणा होने के बाद सपा और भाजपा दोनों तैयारियों में जुट गए थे। जहां एक ओर 1996 से सपा के कब्जे में रही मैनपुरी की सीट नेता जी का परिवार किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता है तो भाजपा भी इस सीट पर कब्जा करके सपा को झटका देना चाहती है।
सैफई से लेकर लखनऊ तक सपा कार्यालयों में बैठकों का दौर चल रहा है। वहीं इस सीट को भाजपा के दिल्ली वाले चाणक्य पूरा मथ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, दोनों ही दल प्रत्याशी खड़े करने की भूमिका लगभग तैयार कर चुके हैं। एक दूसरे के दांव का इंतजार कर रहे हैं। सपा से मुलायम परिवार के ही दिग्गज को सामने लाने की तैयारी है, जबकि भाजपा भी सपा के करीबी लोगों पर दांव लगाकर बाजी मारने की हसरत में है।
मैनपुरी सीट में वोटों का गणित
2019 के आंकड़े देखें तो मैनपुरी लोकसभा सीट पर करीब 19 लाख वोटर हैं। कुल वोटरों में से 38 प्रतिशत मतदाता यादव हैं। इसके बाद राजपूत, चौहान, राठौर, भदौरिया करीब 30 प्रतिशत हैं। फिर यहां शाक्य, ब्राह्मण, एससी और मुस्लिम मतदाता हैं।
1952 से 1971 तक रहा कांग्रेस का कब्जा
ताखा। मैनपुरी लोकसभा सीट पर 1996 से लगातार सपा ने जीत दर्ज की है। सन 1952 से लेकर 1971 कांग्रेस को जीत हासिल हुई। 1977 की सत्ता विरोधी लहर में जनता पार्टी ने कांग्रेस के प्रत्याशी को हरा दिया। हालांकि 1978 में यहां उपचुनाव हुए। इसमें कांग्रेस की इस सीट पर वापसी हुई। 1980 में कांग्रेस ने मैनपुरी लोकसभा सीट एक बार फिर गवां दी और 1984 में उनके प्रत्याशी को एक बार फिर जीत मिली। यह वह साल था जब कांग्रेस को इस सीट पर आखिरी बार जीत मिली थी। 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन करने के बाद मुलायम सिंह यादव इस सीट से 1996 में चुनाव लड़े और उन्होंने भारी अंतर से जीत हासिल की। उसके बाद से लगातार हर चुनाव में इस सीट पर समाजवादी पार्टी का ही कब्जा रहा है।