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इटावाः अब आंसुओं की बाढ़ और दुश्वारियों के पहाड़

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इटावा/चकरनगर। बीते 24 घंटे में चंबल का जलस्तर 1.76 मीटर कम जरूर हुआ है, लेकिन लोगों की दुश्वारियां कम नहीं हुई हैं। बाढ़ प्रभावित गांवों के अधिकतर घरों में पानी घुसा होने के बावजूद प्रशासन उनके लिए कोई खास इंतजाम नहीं पा रहा है। चारों ओर भरे पानी के बीच जीवन काट रहे लोग अब बीमार होने लगे हैं। पशुओं में भी बीमारियां फैलने लगी हैं। इन तक उपचार पहुंचना मुश्किल हो रहा है। हालात बता रहे हैं कि अब लोगों की आंखों में आंसुओं की बाढ़ है और दुश्वारियों के पहाड़ हैं।
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ललूपुरा गांव के पूर्व प्रधान उमेश दुबे ने बताया कि गांव में पानी भरने की वजह से बीमारियां फैलने लगी हैं। गाय-भैंस चार दिन में ही दूध कम देने लगे हैं। गांव के करीब 14 पशु बीमार हैं। पशु विभाग की टीम को सूचना दी गई है। ककरहिया गांव के संग्राम सिंह ने बताया कि सात वर्ष की बेटी पूजा के शरीर में फोड़े-फुंसियां होने लगी हैं। कई दिनों से पानी के बीच जीवन बिताने से घर के सभी लोग जुकाम, बुखार और खुजली से हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने दवाइयां उपलब्ध कराई हैं, लेकिन उनसे राहत नहीं मिल रही है।
उप जिलाधिकारी मलखान सिंह ने कहा कि क्षेत्र के बाढ़ ग्रस्त सभी गांव में राशन पहुंचाने काम किया जा रहा है। जिन लोगों के पास अभी तक मदद नहीं पहुंची है उन्हें जल्द से जल्द मदद पहुंचाई जाएगी। नदी का पानी कम हो रहा है, जल्द ही स्थिति सामान्य होगी।
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रसोई गैस खत्म, चूल्हे भी गीले
बाढ़ का पानी घरों में घुसने के बाद बचने के लिए छतों पर डेरा डाले लोगों के लिए अब बारिश मुसीबत बन रही है। रसोई गैस और राशन खत्म होने की कगार पर है। छत पर रखा राशन और चूल्हा भी गीला होने से ग्रामीण परेशान हैं। बाढ़ के बीच घिरे परिवारों को अब भुखमरी का डर सताने लगा है।
भरेह गांव की गीता बताती हैं कि चंबल का जलस्तर बढ़ने से घर का भूतल जलमग्न है। आटा, दाल, सब्जी खत्म होने को है। रसोई गैस कभी भी खत्म हो सकती है। छत पर किसी तरह रातें बिता रहे हैं। शुक्रवार रात हुई बारिश ने बचाकर रखे राशन और चूल्हा जलाने के लिए रखे उपलों और लकड़ियों को भी भिगा दिया है। चार दिन बीतने की बावजूद प्रशासन की ओर से अभी तक कोई मदद नहीं मिली है।
अधपका खाना बनाकर भर रहे पेट
ककरैया गांव निवासी कुसुमा ने बताया कि यमुना का पानी झोपड़ी में घुस गया है। जरूरी सामान लेकर डेढ़ किलोमीटर दूर एक तंबू लगाया है। बारिश होने की वजह से ईंधन भीग गया है। कई घंटों की मशक्कत के बाद गीली लकड़ियों से ही किसी तरह चूल्हा जलाकर नमक, तेल के बिना अधपका खाना बनाकर बच्चों समेत घर के चारों सदस्यों का पेट भर रहे हैं। एक-दो दिन में बचा हुआ राशन भी खत्म हो जाएगा। प्रशासन कब सुध लेगा पता नहीं है।
एक दो दिन के लिए बचा राशन
रनिया गांव के शोभाराम ने बताया कि छत पर परिवार के साथ डेरा डाले हैं। चूल्हा जलाकर अभी तक खाना बना रहे हैं। अब लकड़ियां खत्म हो गई हैं। ऐसे में अब सूूखी लकड़ियां लाना चुनौती है। राशन भी खत्म हो रहा है। यही स्थिति रही तो भुखमरी आ जाएगी। खेरापुरा के फूल सिंह, सोनेलाल सेतु, रमेश, प्रमोद, जगराम आदि बताते हैं कि पूरा मजरा चंबल नदी के पानी में डूबा हुआ है। राशन खत्म होने की कगार पर है। बचे राशन से थोड़ा खाना खाकर काम चला रहे हैं। यदि एक दो दिन में प्रशासन ने कोई मदद नहीं दी तो चाहें बाढ़ से बच जाएं, लेकिन भुखमरी से लोग मरने लगेंगे। सामाजिक संगठन भी वैसे बहुत नजर आते हैं, लेकिन इस आफत की घड़ी में कोई नजर नहीं आ रहा है। (संवाद)

कुसुमा। संवाद- फोटो : ETAWAH

गीता। संवाद- फोटो : ETAWAH

घरों में पानी भर जाने की वजह से खेतों में तंबू लगाकर रह रहे खेरापुरा गांव के लोग। संवाद- फोटो : ETAWAH

इटावाः गोहानी गांव की गली में भरे पानी से गुजरते बच्चे। संवाद- फोटो : ETAWAH

इटावाः भरेह चकरनगर मार्ग पर पानी भरने पर डूब कर निकलता ट्रैक्टर व ग्रामीण। संवाद- फोटो : ETAWAH

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