आज बातें इटावा की। यहां के सियासी मिजाज और अंदाज की। इटावा का नाम आते ही जेहन में कई सवाल उभर आते हैं। वह सीट जिसने बसपा के संस्थापक कांशीराम को जिताया। मुलायम परिवार का गढ़ बनी। वह सीट जहां दलित आबादी 26.85 फीसदी है। वह सीट जो 2009 से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। पर, दलितों को केंद्र में रखकर सियासत करने वाली बसपा सीट सुरक्षित होने के बाद यहां जीत दर्ज नहीं कर सकी।
जिला तो बना पर, नहीं मिलीं सुविधाएं
सुभाष चौक के पास मिले राजेश वाजपेयी, अमर विश्नोई कहते हैं, जिला बनने के 27 साल बाद भी कई कार्यालय इटावा में हैं। राजकुमार सक्सेना उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, जनप्रतिनिधि जीतने के बाद औरैया नहीं आते। अमर विश्नोई कहते हैं, सांसद सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, औरैया पर ध्यान नहीं दिया। रामकुमार विश्नोई अस्पताल में सुविधाओं के अभाव का मुद्दा उठाते हैं। इसपर अजीत कहते हैं कि भाजपा ने गुंडागर्दी रोकी है। भानू राजपूत भी उनकी बात का समर्थन करते हैं। पर, वे यह भी कहते हैं कि सांसद का व्यवहार अच्छा नहीं है, लेकिन वोट देना मजबूरी है।
स्थानीय मुद्दों पर मतदाता मुखर
दिबियापुर में मिले जय प्रकाश कहते हैं कि कस्बे में बने ओवरब्रिज के बगल में ही दूसरा ओवरब्रिज बनाने की बात चल रही है। इससे पूरा कस्बा तबाह हो जाएगा। हम लोग चाहते हैं कि उसे बाईपास करके बनाया जाए। वहीं प्रेम शंकर कोरोना काल में दिबियापुर में बंद की गई ट्रेनों को फिर से चलाने की जरूरत बताते हैं। कहते हैं, इसे लेकर कई बार पत्र लिखा गया। सुनवाई नहीं हुई।
समर में योद्धा
रमाशंकर कठेरिया, भाजपा : मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री रह चुके हैं। भाजपा ने दूसरी बार भरोसा जताया है। परंपरागत वोटबैंक साथ है। पर, लोकसभा क्षेत्र के कई भाजपा नेता नाराज हैं। भितरघात की आशंका है। उनको एकजुट करना चुनौती है।
जितेंद्र दोहरे, सपा : बसपा काडर से आए हैं और पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। दलितों में दोहरे बिरादरी का वोटबैंक सर्वाधिक है। सपा के परंपरागत वोटबैंक के साथ बिरादरी का भरोसा। दलित वोटबैंक को साधे रखने की चुनौती है।
सारिका सिंह, बसपा : हाथरस की पूर्व सांसद। इटावा में मायका है। बघेल परिवार में शादी होने की वजह से उस जाति के वोटबैंक का भी भरोसा। दलित वोटबैंक को बचाए रखने की चुनौती।