एटा। अमेरिका के विभिन्न राज्यों के आर्य समाजों द्वारा अंतरराष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन न्यूयॉर्क स्थित हॉफ्स्ट्रा यूनिवर्सिटी में हुआ। 19 से 21 जुलाई तक चले इस आयोजन में एटा गुरुकुल के 3 स्नातकों को आमंत्रित किया गया था। उन्होंने सभी को आर्य समाज का महत्व समझाया।
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती की 200वी जयंती पर महासम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें 15 देशों के लगभग 700 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। आर्ष गुरुकुल यज्ञ तीर्थ एटा के स्नातक कमलेश शास्त्री, प्रो. विद्यालंकार और मॉरीशस में पुरोहित के कार्य कर रहे सुरेश आमंत्रित थे। महासम्मेलन के प्रारंभ में सामवेद परायण महायज्ञ प्रो. विनय विद्यालंकार ने कराया। यह 10 घंटे चला।
वैदिक विषयों पर सत्र के दौरान प्रो. विद्यालंकार ने कहा कि वेद पद है और समस्त ब्रह्मांड अर्थ है। शब्द विद्या और व्यवहारिक ज्ञान की एकता के ज्ञान का मूल परमेश्वर है। शिक्षा को लेकर बताया कि वैदिक शिक्षा में स्रोत परमेश्वर है। आधुनिक शिक्षा में बताया जाता है कि मनुष्य ने प्रकृति से सीखा। सत्य यही है कि ज्ञान का स्रोत परम पिता परमात्मा हैं। जड़ पदार्थ चेतन को शिक्षा नहीं दे सकते। प्रकृति जड़ है, ये हमको ज्ञान नहीं सहयोग दे सकती है।
प्रो. विनयालंकार ने कहा कि वेदों के अनुसार इस दुनिया में दो तरह के ही मनुष्य हैं। आर्य या अनार्य। आर्य समाज की स्थापना परमपिता ने की है। जब आर्य समाज अपनी गरिमा को भूला तो महर्षि दयानंद ने आर्यों को पुराने गौरव का स्मरण कराया। कमलेश शास्त्री और सुरेश ने भी अपने विचार रखते हुए आर्य संस्कृति को समझाया।