एटा। लंबा इतिहास समेटे शहर के घंटाघर का कुछ हिस्सा जर्जर हो गया है। पालिका इसे हटाना चाहती है, लेकिन स्थानीय लोगों ने विरोध जता दिया है। उनका कहना है कि शहर की पहचान इस एतिहासिक इमारत में किसी तरह की छेड़छाड़ मंजूर नहीं।
अंग्रेजों के शासनकाल में उस समय शहर के बीचोंबीच इस घंटाघर का निर्माण कराया गया था। वर्ष 1903 में नगर पालिका ने इसे बनवाया था।जिसकी ऊंचाई करीब 100 फीट है। अपने समय की यह शहर की सबसे ऊंची इमारत थी। एक सदी और दो दशक से यह शहर की पहचान और शासन बना हुआ है। इसी घंटाघर के तले स्वतंत्रता संग्राम की तमाम गतिविधियां भी हुईं। आजादी के बाद भी इसका महत्व कम नहीं हुआ। लेकिन समय गुजरने के साथ यह कमजोर पड़ने लगा। फिलहाल घड़ी तो बंद है ही, अधिक ऊंचाई की वजह से साफ-सफाई भी नहीं हो पाती। देखरेख और मरम्मत के अभाव में बाहर की ओर इसका एक हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर गिरासू हाल में पहुंच गया है। इसी हिस्से को नगर पालिका द्वारा तोड़ने जाने की बात कही जा रही है। पालिका के मुताबिक यह हिस्सा दिन में गिरता है तो नीचे मौजूद लोगों को नुकसान पहुंचा सकता है। बृहस्पतिवार की रात इसे तोड़ने के लिए पालिका की टीम भी पहुंची। जिसका स्थानीय लोगों ने विरोध कर दिया।
घड़ी की कराई जा रही मरम्मत, जल्द बजेगा घंटा
घंटाघर पर लगी विशाल घड़ी करीब 10 साल से बंद पड़ी है। इसमें टूट-फूट भी हो गई है। नगर पालिका द्वारा इसकी मरम्मत शुरू करा दी गई है। जहां इसको नया रूप दिया जाएगा, वहीं इसमें मोटर लगाकर बिजली से संचालित किया जाएगा। हर घंटे पर बजने वाले घंटे की आवाज फिर पूरे शहर में गूंजेगी।
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घंटाघर शहर के लोगों के लिए केवल इमारत नहीं, विरासत है। इसको सहेजने और संरक्षित करने की जरूरत है। इसमें किसी तरह की तोड़-फोड़ नहीं की जानी चाहिए। - अंशुल जैन, दवा व्यापारी
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इसके और भी भाग क्षतिग्रस्त होंगे, लेकिन एतिहासिक इमरात का कोई भी हिस्सा हटाना उचित नहीं है। नगर पालिका को इसका संरक्षण करते हुए मरम्मत कराना चाहिए। - ललित चौहान, सराफ
जर्जर हिस्सा अलग से लगा हुआ है, जिसको हटाने से घंटाघर के रूप में किसी तरह का परिवर्तन नहीं होगा। यह जर्जर हिस्सा गिरा तो लोगों को चोटिल कर सकता है। इस खतरे को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। दो दिन पहले हाइड्रा मशीन भेजी गई थी, जो ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाई। अग्निशमन विभाग की मदद मांगी गई है। - सुधा गुप्ता, पालिकाध्यक्ष