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Deoria News: दिखावे के लिए नौकरी, मरीजाें के धंधे से बने धनवान, बना लिया मकान, अस्पताल

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गोरखपुर और शहर के निजी अस्पतालों के लिए होता है कमीशन के चक्कर में सौदा
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संवाद न्यूज एजेंसी



देवरिया। महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज से मरीजों का सौदा होता है। यह बात कहने, सुनने में थोड़ी अजीब जरूर है, लेकिन पूरी तरह सही है। निजी और सरकारी अस्पताल में छोटी सी नौकरी, छोटे से मेडिकल स्टोर और एंबुलेंस से धंधा करने वालों ने मरीजों को बेचना शुरू कर दिया है। जैसे-जैसे उनकी घुसपैठ और साठगांठ बढ़ी, वैसे ही वे धनवान बनते गए। ऐसे लोगों के पास अब लाखों रुपये का मकान, अपनी कार और खुद का अस्पताल हो गया है। सबसे गंभीर बात तो यह है कि दलाली का धंधा जगजाहिर है, लेकिन इन पर अंकुश लगाने की कोशिश होती भी नहीं हो रही है।





मेडिकल कॉलेज के जिला अस्पताल में बिना किसी नौकरी या धंधे के दिन और रात में नजर आने लोगों की पैठ इतनी अच्छी हो गई थी, वे आउटसोर्स कर्मी बनकर अधिकृत कर्मचारी हो गए हैं, अन्य पदों पर भी उन्हें पहुंच का लाभ मिल गया है। डॉक्टर के केबिन में अक्सर बैठने वाले एक व्यक्ति ने अपना अस्पताल बना लिया और उसी के अस्पताल में डॉक्टर बैठने लगे हैं। तीन मेडिकल स्टोर संचालकों ने एंबुलेंस खरीद लिया और गोरखपुर तक अपना नेटवर्क फैला लिया। मरीजों को बेचने के धंधे का खेल यह है कि एक मेडिकल स्टोर कर्मी से जमीन खरीदा और आलीशान मकान बनवा लिया है। उससे जुड़े दलाल रात में भी वार्डों में घूमकर दवा तक मुहैया कराते हैं। इतना ही नहीं कुछ ने तो कम पढ़ा लिखा होने के बाद भी खुद का अस्पताल खोल लिया और आशाओं से साठगांठ कर धंधा चमका लिया है। शहर के एक मुहल्ले में दो लोग डाॅक्टर की कार चलाते थे और इस समय अस्पताल के मालिक बन बैठे हैं। यहां तक की जिस जगह पर पर्ची बनती है, वहां पर अक्सर मंडराते हैं। मेडिकल काॅलेज के सीएमएस डाॅ. एचके मिश्र ने अभी कुछ दिन पहले पुलिस अधीक्षक को पत्र भेजकर मेडिकल काॅलेज के गेट पर लगने वाले एंबुलेंस को हटाने के लिए कहा है। जबकि दूसरी तरफ डिप्टी सीएम ने भी सख्त आदेश दिया था कि किसी भी हाल में निजी एंबुलेंस सरकारी अस्पताल के पास नहीं लगनी चाहिए, लेकिन आदेश बेअसर साबित हो रहा है। इस कारण मरीज माफिया के तार एक दूसरे से ऐसे जुड़े हैं कि किसी को भनक भी नहीं होती और सस्ते इलाज की आस लिए मेडिकल कॉलेज आया मरीज बिककर शहर विभिन्न निजी अस्पतालों में पहुंच जाता है। फिर बिल चुकाने में उनके पसीने छूट जाते हैं।
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मीठे बोल में फंसा लेते हैं मरीज माफिया के गुर्गे


देवरिया। मरीजों को बहका कर निजी अस्पतालों में भेजने वाले मरीजों के दिल में पहले जगह बनाते है। मीठी बोल के दम पर उनका विश्वास जीत लेते है। मरीज को नर्सिंग होम भेजने के लिए तीन स्तर पर काम होता है। पहले तो एंबुलेंस व ऑटो वाले सक्रिय रहते हैं। दूसरा, इमरजेंसी में कर्मचारी की तरह कार्य करने वाले लोग, तीसरा मरीज को अच्छा सुझाव देकर बाहर भेजने वाले कर्मचारी। एक और स्तर भी है, जो बाहर के मरीज को सरकारी अस्पताल आने ही नहीं देता, उससे यह कह देता है कि वहां पर न तो इलाज है और न ही बेड खाली रहते हैं। इस कारण वह झांसे में आ जाते हैं।


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मरीज के बदले मिलती है मोटी रकम
देवरिया। सरकारी अस्पताल से निजी अस्पतालों को मरीज भेजने पर मोटी रकम की दलाली मिलती है। एक मरीज को प्राइवेट अस्पताल भेजने पर पांच से दस हजार रुपये तक मिल जाता है। इसमें पांच हजार एंबुलेंस माफिया और पांच हजार अन्य के हिस्से में जाता है। अगर, मरीज आईसीयू में भर्ती होने लायक है तो 30 से 35 हजार रुपये भी मिल सकते हैं। एंबुलेंस माफिया को यह रकम नर्सिंग होम से नकद दी जाती है, यही वजह है कि इस धंधे को पूरे मनयोग से करने वाले कर रहे हैं। इसमें कोई उधारी का सिस्टम नहीं है।

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एंबुलेंस के नाम पर खानापूर्ति


एंबुलेंस को आरटीओ से रजिस्ट्रेशन में कई सहूलियत मिलती है, लेकिन उसके कई मानक भी होते हैं। पर सच तो यह है कि बिना मानक के ही मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ कर बिना ऑक्सीजन, ट्रेंड पैरामेडिकल स्टाफ के ही मरीजों को ले जाने और लाने का काम किया जा रहा है। करीब एक साल पहले जब एआरटीओ ने जांच की तो 12 एंबुलेंस भी पकड़े गए थे। पर जांच के बाद फिर से धंधा करने लगे।


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संसाधन व बेहोशी के डॉक्टर न होने का खूब उठा रहे फायदा
जिला महिला अस्पताल और देहात के सरकारी अस्पतालों में बेहोशी के डाॅक्टरों की कमी का दलाल खूब फायदा उठा रहे हैं। हालत यह है कि महिला अस्पताल में दो डाॅक्टर हैं, रात में और रविवार को नहीं आते हैं। इस दिन दलाल खास सक्रिय रहते हैं।


सेटिंग न होने पर लूट लेते हैं मरीजों को

केस एक- एंबुलेंस चालक महेंद्र ने बताया कि कुछ माह पहले वह मरीज लेकर गोरखपुर जा रहा था। इसी दौरान गोरखपुर के कुसम्ही के पास कार सवार आए और रोक लिए। इसके बाद मरीज को अपने वाहन में बैठा कर लेकर चले गए। विरोध करने पर उसकी पिटाई भी किए।
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केस नंबर दो

एंबुलेंस चालक अनिल ने बताया कि रात के वक्त गोरखपुर मरीज ले जाना आसान नहीं है। एक बार गोरखपुर जाते समय खोराबार के पास कार सवार आए और आगे से रोक लिए। इसमें से एक व्यक्ति कार एंबुलेंस में बैठ गया और पैडलेगंज ले जाकर मरीज को जबरन भर्ती करा दिया। इस कारण मरीज के चालीस हजार रुपये का दवा का भरना पड़ा।
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केस नंबर तीन
मोटी रकम के खेल में अभी तीन माह पहले सलेमपुर की दो गर्भवती की जान भी चली गई थी। हालत गंभीर होने पर गोरखपुर के अस्पताल से सौदा हुआ और दोनों को सरकारी अस्पताल से वहां के लिए रवाना कर दिया गया। रास्ते चौरीचौरा के पास दोनों की मौत हो गई।










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कुछ आशाओं के भी मरीज माफिया से संबंध

देवरिया। मरीजों को दूसरे अस्पताल में भेजकर मोटी रकम कमाने के धंधे में कुछ आशाएं भी शामिल है। अभी दो माह पहले 119 आशाओं को नोटिस दी गई थी कि वह निजी अस्पतालों को मरीज भेज रही है। इतना ही नहीं पुलिस रिकार्ड पर गौर किया जाए तो करीब सात आशाओं पर केस दर्ज भी हो चुका है।
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- अस्पताल में एंबुलेंस की सुविधा है। निजी एंबुलेंस को अस्पताल में नहीं खड़ा करने के निर्देश दिए गए हैं। इस पर रोक के लिए एसपी को भी पत्र लिखा गया है।
डॉ. एचके मिश्रा, सीएमएस
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