देवरिया। बिना पंजीकरण और पैरामेडिकल स्टाफ के संचालित शहर के दो निजी अस्पतालों के खिलाफ एसीएमओ ने शुक्रवार को केस दर्ज कराया है। स्वास्थ्य विभाग के छापे के दौरान इन अस्पतालों की कमियां पकड़ में आईं हैं। ये दो अस्पताल तो बानगी भर हैं। शहर में ऐसे दर्जनों मुन्ना भाई अस्पताल वाले हैं जो बिना मानकों को पूरा किए ही अस्पतालों का संचालन करा रहे हैं। ऐसे में जरूरत है कि इनसे बचें, क्योंकि आपके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी आपकी ही है।
एसीएमओ डाॅ. राजेंद्र प्रसाद की टीम को कुछ दिन पहले शिकायत मिली थी कि शहर के भीखमपुर रोड पर संचालित स्टार डेंटल क्लीनिक का पंजीकरण नहीं है। टीम ने मौके पर जांच की तो पता चला कि डाॅ. आई खान क्लीनिक का संचालन करते हैं। निरीक्षण में कुछ दवाएं, डेंटल सर्जिकल मशीनें क्लीनिक पर मौजूद थीं। बिना किसी अर्हता, योग्यता और पंजीकरण के क्लीनिक चल रही थी। जब टीम ने डॉक्टर से पूछा तो वह कुछ बता नहीं सके। यहां तक कि पैरामेडिकल स्टाफ भी नहीं था। इसी तरह एसीएमओ ने 27 जुलाई को एक शिकायत पर रामनाथ देवरिया मोहल्ले ने शिव क्लीनिक पर छापा मारा तो छह महिला मरीज मौजूद थीं। संचालक डॉ. प्रेम प्रकाश बरनवाल ने पंजीकरण नहीं कराया था। इसके बावजूद भी आराम से मरीज को लिटाकर जांच कर रहे थे। इस मामले में डॉ. प्रेम प्रकाश बरनवाल और आई खान के खिलाफ धोखाधड़ी और इंडियन मेडिकल कांउसलिंग एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है। इस कार्रवाई से अन्य मुन्ना भाइयों में हड़कंप है। कइयों ने तो तथ्यों को छिपाकर रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन भी कर दिया है।
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एंबुलेंस चालकों के गठजोड़ से मुन्ना भाइयों की चांदी
महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज और तहसील मुख्यालयों पर स्थित सरकारी अस्पतालों पर मौजूद रहने वाले एंबुलेंस चालकों और कुछ आशा कार्यकर्ताओं के सहयोग से इन निजी अस्पतालों के संचालकों का धंधा फल-फूल रहा है। कमीशन के लालच में सरकारी अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को इनके यहां पहुंचा दिया जाता है। इसका प्रमाण यह है कि अभी कुछ माह पहले 119 आशाओं को स्वास्थ्य विभाग ने नोटिस दिया था। इतना ही नहीं, कुछ आशा कार्यकर्ताओं के खिलाफ केस भी दर्ज हो चुके हैं। आरोप है कि इन्होंने प्रसूताओं को निजी अस्पताल पहुंचा दिया और ऑपरेशन से डिलीवरी के दौरान उनकी मौत हो गई।
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केस नंबर-एक
शहर के रुद्रपुर मोड़ पर स्थित एक निजी अस्पताल चलाने वाली महिला कक्षा आठवीं पास है। पहले एक अस्पताल में काम करती थी। धीरे-धीरे इसने खुद का अस्पताल खोल दिया। अब दलालों के जरिए अस्पताल चल रहा है।
केस नबर-दो
शहर के सीसी रोड स्थित एक अस्पताल संचालक काफी पहले एक डॉक्टर की कार चलाते थे। इसके बाद स्वयं का अस्पताल खोल लिए और इंटर पास हैं। अब खुद लग्जरी कार से चलते हैं।
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गर्भवतियों की हो चुकी है मौत
केस नंबर-एक
- सलेमपुर के एक निजी अस्पताल में आठ माह पहले आशाओं ने दो गर्भवती को बेहतर इलाज का झांसा देकर भर्ती कराया। जब दोनों की हालत नाजुक हुई तो उन्हें गोरखपुर रेफर कर दिया गया। रास्ते में जाते समय मौत हो गई।
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केस नंबर-दो
- शहर के रामनाथ देवरिया और खोराराम में करीब चार माह पहले सरकारी अस्पताल से बेहतर इलाज का वादा कर कुछ दलालों ने गर्भवतियों को भर्ती करा दिया। दोनों जगहों पर ऑपरेशन के दौरान दोनों की मौत हो गई।
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कोट
पंजीकृत अस्पतालों की संख्या जिले में 39 है। छह माह के भीतर पांच अस्पतालों को सील किया गया है, जिनके पास न डॉक्टर थे और न पंजीकरण था। जबकि कमियां मिलने पर बीस अस्पतालों को नोटिस भेजा गया है।
डॉ. आरपी यादव, नोडल अधिकारी