फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Deoria News: भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं कुलकुला माई

विज्ञापन
कुलूकुला देवी माता मं​दिर।
विज्ञापन
- प्रयागराज के संगम जितना पवित्र है त्रिमुहानी घाट
विज्ञापन

संवाद न्यूज एजेंसी
देवरिया। कुशीनगर-देवरिया जनपद के संधि स्थल तरकुलवा विकास खंड के आखिरी छोर पर सिसवा-मुड़िकटवा व नरायनपुर गांव से सटे कसया तहसील के कुड़वा दिलीपनगर की सीमा में स्थित कुलकुला माई का स्थान अत्यंत प्राचीन है। इस पवित्र स्थान का उल्लेख महाकवि कालिदास के महापुराण मेघदूतम्, मार्कंडेय पुराण और दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में भी मिलता है।



यूं तो इस स्थान पर हर रोज भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन शारदीय व चैत्र नवरात्र में यहां विभिन्न जनपदों और पड़ोसी प्रांत बिहार सहित दूरदराज से बड़ी संख्या में भक्त आते हैं और कुलकुला भगवती की पूजा-अर्चन कर मन्नतें मांगते है। मान्यता है कि कुलकुला माई भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्व करती हैं। कुलकुला भगवती का स्थान हिरण्यवती, कामावती और रामावती नदियों के संगम पर घने जंगल के बीच स्थित है। जनश्रुतियों के अनुसार देवी दुर्गा के अनन्य भक्त रहसूं के बुलाने पर देवी दुर्गा जब कौड़ी कामाख्या से चलीं तो कुछ क्षण रुककर यहां विश्राम की थीं। यहां ईंट की चहारदीवारी के भीतर मिट्टी से निर्मित दो पिंडी है, जिसमें से दक्षिण की पिंडी देवी दुर्गा की तो उत्तर की पिंडी दुर्गासप्तशती के रचनाकार मेघा ऋषि की है। कुलकुला देवी बिना छत वाली मां के नाम से प्रसिद्ध हैं। लोग बताते हैं कि कुड़वा दिलीपनगर के राजा दिलीप सिंह ने कई बार यहां देवी का भव्य मंदिर बनवाने का प्रयास किया, लेकिन देवी मां ने बनने नहीं दिया।
विज्ञापन




दिन में जितना काम होता था वह रात्रि के समय ध्वस्त हो जाता था। एक बार मां ने राजा दिलीप सिंह को रात्रि के समय स्वप्न दिखाया कि उन्हें छत की बजाय खुले में रहना पसंद है। यह स्थान को प्रभु श्रीराम के पुत्र कुश की राजधानी कुशावती के नाम से भी प्रसिद्ध है, जहां उन्होंने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया था। यहां से प्रस्थान करते समय उन्होंने इसे अपने पुरोहित और सेवकों को दान कर दिया था। यही पर सतयुग के राजा सूरत को दुर्गासप्तशती के रचनाकार मेधा ऋषि ने दुर्गासप्तशती का पाठ सुनाया था। जिससे प्रसन्न होकर माता ने उन्हें मनोवांछित फल प्रदान किया था। महाभारत काल में अज्ञातवास की अवधि में पांडव प्रभु श्रीकृष्ण के आदेश पर यहां आकर देवी दुर्गा की कठोर साधना कर विजय का आशीर्वाद प्राप्त किए थे।
विज्ञापन


कुशीनगर जाने से पूर्व भगवान बुद्ध इस पवित्र स्थान पर आए थे, उन्होंने यहां पवित्र कुकुत्था नदी में स्नान किया था। यहां के तीन नदियों के संगम त्रिमुहानी नदी के जल को पीकर देवी दुर्गा अपनी प्यास बुझाई थीं, जिससे इसे प्रयाग के संगम के समान पवित्र माना जाता है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें