फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Deoria News: 15 दिन जेल में रहा, आज भी लड़ता हूं केस...अब दिल को मिल रहा सुकून

Mon, 15 Jan 2024 12:56 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
विज्ञापन
विज्ञापन
रूप बदलकर कारसेवकों को अयोध्या तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाई
विज्ञापन

सदर सांसद डॉ. रमापति राम ने मंदिर आंदोलन से जुड़ीं यादें साझा कीं


देवरिया। राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वालों में एक नाम भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व वर्तमान में सदर सांसद डॉ. रमापति राम त्रिपाठी का भी है। कारसेवकों को अयोध्या पहुंचाने की मिली जिम्मेदारी का जहां रूप बदलकर निर्वहन किए। वहीं अयोध्या जाते समय पुलिस की गिरफ्तार के बाद 15 दिन गोंडा जेल में भी रहना पड़ा। वह कहते हैं कि आंदोलन के दौरान की सारी यातनाएं अब भव्य राम मंदिर का निर्माण देख सुकून में बदल गई हैं। 22 जनवरी देश की अस्मिता और स्वाभिमान की प्रतिष्ठा की तिथि हैं। श्रीराम सिर्फ हिन्दुओं नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए आदर्श है।
सदर सांसद ने बताया कि वर्ष 1980 से 1992 तक चले राम मंदिर आंदोलन के दौरान उनके पास विभाग संगठन मंत्री की जिम्मेदारी थी, जो इस समय क्षेत्रीय अध्यक्ष का पद हो गया है। पुलिस की नजरों से बचकर कारसेवकों को अयोध्या तक पहुंचाना और बिहार से आने वाले रथ यात्रा को अयोध्या तक लेकर जाना था। कुशीनगर के बथनाकुटी के पास कारसेवकों को रथ यात्रा के स्वागत करने की तैयारी गांवों में जन जागरण कर किया जा रहा था, लेकिन बिहार में रथ यात्रा को रोक लिया गया। राममंदिर आंदोलन को सफल बनाने के लिए खाकी से भी दूरी बना ली थी। पैंट-शर्ट और दाढ़ी बढ़ाकर कारसेवकों को गोरखपुर से सरयू नदी नाव से पार करा अयोध्या तक पहुंचाना पड़ता था। तब मोबाइल नहीं था। इसलिए जहां से कारसेवक ट्रेनों से चलते थे। वहां से उन्हे संकेत बता दिया जाता था। स्टेशन पर उतरने के बाद मुंह पर बार-बार रूमाल फेरना या कंधे पर सफेद अगौछा रखना आदि संकेत था। ट्रेन से उतरने के बाद इसे देख कारसेवक समझ जाते थे और वहां से जिधर मैं चलता था। पीछे-पीछे चल देते थे। पुलिस को भनक तक नहीं लगती थी। 1991 में गोरखपुर रेलवे स्टेशन से मैं और सूर्यप्रताप शाही रिक्शा से चले रेलवे कालोनी में रात को रुकना था। एक दरोगा पीछा करते हुए ठिकाने तक पहुंच गया। लगा कि अब गिरफ्तारी हो जाएगी, लेकिन दरोगा बोला कि मेरी ड्यूटी लगाई गई है। इस स्थान की जानकारी पुलिस को हो गई है। यहां आप लोग मत रूकिए। इसके बाद स्थान बदलना पड़ा। गोंडा के जेल में कारसेवकों के साथ पुलिस वाले जब अभद्रता किए तो जेलर से बहस हो गई थी। आंदोलन के समय गोरखपुर में दर्ज हुआ मुकदमा आज भी मैं लड़ रहा हूं। राम मंदिर का निर्माण और भगवान राम के प्राण प्रतिष्ठा के लिए चल रही तैयारियों को देख अब सिर्फ राम याद आ रहे हैं और कुछ नहीं।
विज्ञापन

-
...जब छतों के रास्ते दस घर करना पड़ा था पार
-1992 में कारसेवकों पर पुलिस की कड़ी नजर थी। सुबह दूसरे प्रांत से ट्रेन से कारसेवक गोरखपुर आने वाले थे। उन्हे रिसीव करना था। इसलिए मैं गोरखपुर के हुमायूंपुर निवासी ईंट भट्ठा व्यवसायी केवी सिंह के घर भोजन करने के बाद सो रहा था। रात करीब 1 बजे घर को पुलिस ने घेर लिया। अब जाऊं तो जाऊं कहां, लेकिन मारवाड़ी लोगों का मोहल्ला होने के कारण एक दूसरे से मकान सटा था। छतों के रास्ते दस घर पार कर दूसरे घर में चला गया और बेसमेंट में रात गुजारी। मेरे जाने के बाद केवी सिंह ने फाटक खोला तो घर की तलाशी कर पुलिस चली गई। इसी तरह उर्दू बाजार में विजय बरनवाल के घर सोते समय रात को पुलिस ने दबिश दी थी। उस समय मेरी दाढ़ी बढ़ी थी। विजय की मां ने कंबल ओढा दिया और किनारे खाट पर लिटा दिया। पुलिस घर में घुसी और पूछी तो उनकी मां ने बताया कि रिश्तेदार हैं। तबीयत ठीक नहीं है, तो पुलिस वाले चले गए। आंदोलन के समय अधिकांश रात बिहार के गांवों में सूर्यप्रताप शाही और मेरी कटी। क्योंकि उत्तर प्रदेश में कर्फ्यू जैसा माहौल था।
विज्ञापन

-
दरोगा पर हमले में दर्ज हुआ केस
-डॉ. रमापति ने बताया कि दूसरी बार जब आडवाणी की रथ यात्रा निकली तो गोरखपुर के बाबू मैदान में भाषण होना था। नौसड़ से यात्रा को लेकर वे आगे बढ़ रहे थे तभी सपा कार्यकर्ताओं ने पथराव कर दिया। पथराव करने वालों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर वे लोग वहीं धरने पर बैठ गए। इस दौरान उपेंद्र दत्त शुक्ल (अब इस दुनिया में नहयीं हैं) ने लाठी चलाने वाले एक दरोगा को थप्पड़ जड़ दिया। इस मामले में उपेंद्र के अलावा संतराज यादव और उनपर केस दर्ज किया गया था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें