फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्रांतिकारियों की जमात के आदर्श थे विश्वनाथ राय

विज्ञापन
स्व. विश्वनाथ राय - फोटो : DEORIA
विज्ञापन
क्रांतिकारियों की जमात के आदर्श थे विश्वनाथ राय
विज्ञापन

नाम से ही खौफ खाती थी अंग्रेजी हुकूमत, गिरफ्तारी के दबाव में परिवार और रिश्तेदारों को सहनी पड़ी थीं यातनाएं
खुखुंदू। उनके हौसले को न तो राह की मुश्किलें डिगा सकीं और न ही अंग्रेजों की बर्बरता असर दिखा पाई। आजादी लाना उनका जुनून था और आजाद भारत सपना। घर परिवार की चिंता किए बगैर वह अपने मिशन में लगे रहे। कुछ ऐसी ही शख्सियत थी खुखुंदू के क्रांतिकारी विश्वनाथ राय की। वह गोरखपुर क्षेत्र में क्रांतिकारियों की जमात के आदर्श थे।
प्रयागराज विश्वविद्यालय के लॉ के छात्र विश्वनाथ राय नेशनल यूथ लीग की कार्यसमिति के सदस्य के रूप में 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े। युवाओं के जत्थे के साथ उन्होंने प्रयागराज के घंटाघर पर तिरंगा फहराने का प्रण किया था। इस दौरान दो साथियों की शहादत ने उन्हें इस तरह झकझोरा कि अब तक बापू के अहिंसक आंदोलन को ही आजादी का सही रास्ता मानने वाले विश्वनाथ ने हथियार उठाने का निर्णय लिया।
विज्ञापन

चंद्रशेखर आजाद के सानिध्य में पुलिस से बचते हुए वह दिन-प्रतिदिन अंग्रेजी हुकूमत के लिए सिर दर्द बनते जा रहे थे। आजादी के इस दीवाने को देवली (राजस्थान) के रेगिस्तानी इलाके की जेल में डाल दिया गया। क्रांतिकारी की पत्नी इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकीं और अल्पायु में ही चल बसीं। बेटे के जेल जाने व बहू की मौत के सदमे को उनके पिता भी बर्दाश्त नहीं कर सके। वह भी चल बसे। इस दुखद मौके पर भी बंदी विश्वनाथ राय को अपने पिता के अंतिम क्रिया में शामिल होने का अवसर नहीं मिला।
चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद देवली जेल से आठ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद छूटने पर वह पुन: चंद्रशेखर आजाद की सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के लिए सक्रिय रूप से कार्य करने लगे। 1940 में विश्वनाथ राय एक बार फिर पकड़ लिए गए। इस बार उनके कारावास की अवधि छह वर्ष थी। 1940-46 के कारावास के दौरान ही विश्वनाथ राय का संपर्क उसी जेल में बंद जवाहर लाल नेहरू से हुआ। उनके विचारों से प्रभावित होकर विश्वनाथ राय ने पुन: गांधीवादी रास्ते पर चलने का निर्णय लिया। संवाद
इनसेट...
तीन लोक सभाओं का किया था नेतृत्व, 25 वर्षों तक लगातार रहे सांसद
खुखुंदू। 1952 से 1977 तक लगातार तीन लोक सभा क्षेत्रों देवरिया, पडरौना व सलेमपुर से निर्वाचित संसद सदस्य रहने के बाद समाज सेवा को उन्होंने अपनी प्राथमिकता में रखा। शिक्षा के विस्तार में उन्होंने पैतृक गांव खुखुंदू में शिवाजी बाल विद्यालय, शिवाजी इंटर कॉलेज की स्थापना की। उनके सुपुत्र अजय शर्मा ने शिक्षा के क्षेत्र में और विस्तार करते हुए उनके नाम से डिग्री कॉलेज की स्थापना कराई।
ब्रिटिश हुकूमत की याद ताजा करती है चकिया कोठी
कोठी लुटने से लोगों ने बचाया तो अंग्रेज अफसर ने खुद तिरंगा फहरा कर भारत माता का जयकारा लगाया
प्रतापपुर। भाटपाररानी तहसील मुख्यालय से 16 किलोमीटर की दूरी पर भिंगारी से भवानी छापर मार्ग पर स्थित चकिया कोठी देश की आजादी से पूर्व ब्रिटिश हुकूमत का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। यहां पर गोरों की तूती बोलती थी तथा क्षेत्र में उनकी हुकूमत चलती थी। टूट रही इमारत आज भी ब्रिटिश हुकूमत की याद ताजा करती है।
ईस्ट इंडिया कंपनी की सन 1600 ईसवी में स्थापना के बाद अंग्रेजों ने संपूर्ण भारतवर्ष में अपना पांव पसारना शुरू कर दिया था। इस दौरान गोरों ने अपनी हुकूमत चलाने के लिए क्षेत्र के कुछ स्थानों पर कोठियों का निर्माण कराया, जिसमें चकिया कोठी प्रमुख रही है। इसके अलावा अंग्रेजों ने प्रतापपुर व रतसिया में भी कोठी का निर्माण कराया। चकिया कोठी अंग्रेजी सत्ता संचालन का केंद्र बिंदु रही है।
बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी में सर्वप्रथम एआरसी वाटसन एवं टायस मार्किन मेकडॉनल्ड नाम के अंग्रेज सपरिवार यहां आए। ब्रिटिश शासन के दौरान क्षेत्र में तकरीब 400 एकड़ जमीन पर अंग्रेजों ने खेती भी की तथा प्रतापपुर में चीनी मिल स्थापित की। वहीं, चकिया कोठी स्थित फॉर्म में धान, गेहूं, मक्का, गन्ना के अलावा नील की खेती प्रमुख थी। अंग्रेजों ने यहां नील बनाने के लिए ब्रिटिश इंडिगो फैक्ट्री भी स्थापित की और यहां से नील विदेशों में भेजा जाने लगा।
अंग्रेज यहां लोगों पर जुल्म ढाते थे। जबकि चकिया कोठी के अंग्रेज नित्य घोड़े पर सवार होकर लाल पगड़ी बांधकर गांव-गांव में घूमकर लोगों का हाल-चाल जानते थे। क्षेत्र के पिछड़ेपन को देखते हुए अंग्रेजों ने यहां 1936 में एक अस्पताल व एक स्कूल की भी स्थापना की। प्रमुख अंग्रेज अधिकारी एफ वकील के बाद 1940 में मेजर एआर कैंट अंतिम प्रशासक बनकर यहां आए और अपने मित्रवत व्यवहार के कारण क्षेत्रीय जनता में वह काफी लोकप्रिय रहे ।
विज्ञापन

इसी बीच 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसमें भारत माता को आजादी के दीवानों ने जान की प्रवाह किए बगैर जगह-जगह अंग्रेजों की कोठियां लूटनी शुरू कर दी। इसी क्रम में क्रांतिकारी चकिया कोठी भी लूटने आ पहुंचे। कैंट की उदारवादी नीति के चलते चकिया कोठी के आस पास के ग्राम राजपुर, दीस्तोवली, सिरसिया पवार, करजनिया, पिपरा बघेल, भगतपुरा, भवानी छापर, बलिवन गांव के सैकड़ों लोगों ने कोठी को लूटने से बचा लिया था। इसके एवज में कैंट ने बचाव में आए लोगों को इनाम भी दिया था। लूटने से कोठी बच जाने से गदगद मेजर कैंट ने स्वयं तिरंगा फहरा कर भारत माता का जयकारा लगाया था। संवाद
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें