दो बार के विधायक लेकिन सवारी आज भी साइकिल। पैतृक घर के अलावा कहीं कोई संपत्ति नहीं है। न बंगला, न गाड़ी। ऐसे हैं बरहज के पूर्व विधायक स्वामीनाथ यादव। भागलपुर ब्लॉक के ठेगवल दुबे गांव निवासी स्वामीनाथ को उनकी सादगी और ईमानदारी के कारण लोग बरहज का गांधी कहते हैं।
यह उनकी छवि ही थी कि 1989 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उतरे और पहली बार में ही मोहन सिंह जैसे दिग्गज समाजवादी नेता को हरा दिया। उस चुनाव में उन्हें साइकिल चुनाव चिन्ह मिला था, वही बाद के वर्षों में उनका हमसफर भी बन गया।
अगले चुनाव में 1993 में वह सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी बने और दोबारा जीत हासिल की। पूर्व विधायक के नाते जो पेंशन मिलती है उसी से परिवार चलता है। स्वामीनाथ यादव कहते हैं- जनता ही मेरे लिए सबकुछ है। मैं उनसे दूर नहीं रह सकता।
कहीं कोई सूचना मिलती है तो पूरी कोशिश करता हूं वहां पहुंच जाऊं। परिवार वालों के अनुसार, आज भी वह महीने में दो-चार दिन छोड़कर बाकी समय जनता के बीच ही रहते हैं और उनकी समस्याओं को लेकर आंदोलन करते हैं।
फीस के अभाव में बच्चों का नाम कट गया
पूर्व विधायक स्वामीनाथ के बेटे ठेगवल गांव के प्रधान संजय यादव कहत हैं- पिताजी ने कभी वियायक होने का फायदा नहीं उठाया। उनकी ईमानदारी ऐसी थी कि जब विधायक थे तब दो बेटे संतोष और राजेश का नाम लखनऊ के सिटी मांटेसरी स्कूल में लिखा गया लेकिन फीस के अभाव में उन्हें वहां पढ़ाई छोड़नी पड़ी।