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धकेलने वाले सब थे पर बचाने वाला कोई ना था

Mon, 21 Nov 2016 11:18 PM IST
देवरिया
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परशुराम शर्मा
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कंचनपुर। अस्पताल में भर्ती बहू और उसके बच्चे को घर लाने के लिए रामनाथ को रुपये की दरकार थी। रकम निकालने के लिए सुबह से लाइन में लगे थे। बैंक का ताला खुलते ही अंदर जाने की होड़ में उन्मादी भीड़ के धक्के से गिरे बुजुर्ग खुद को संभाल नहीं सके। इस दौरान उनकी मौत हो गई। जिस किसी ने इस वाकये को सुना सबके मुंह से बरबस यही निकला ‘धकेलने वाले सब थे पर उस बुजुर्ग को बचाने वाला कोई ना था’। उनकी मौत की खबर जैसे ही घर पहुंची लोग रोने लगे। अस्पताल में भर्ती बहू भी बदहवाश हो गई। कनकपुरा के रामनाथ कुशवाहा किसान थे। उनके तीन बेटे हैं।
बड़ा बेटा बाहर रहकर प्राइवेट नौकरी करता है। मझला बेटा बाहर आता-जाता रहता है। छोटा बेटा घर रहकर पिता की मदद करता है। चार दिन पूर्व मझले बेटे को देवरिया के एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई।
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अस्पताल में दवा इलाज के लिए 10 हजार रुपये की जरूरत थी। बेटे के कहने पर रामनाथ सोमवार की सुबह तरकुलवा के भारतीय स्टेट बैंक की शाखा के कतार में लग गए। उन्हें क्या पता था कि अब वह लौटकर नहीं आएंगे। बहू और पोते का मुंह नहीं देख पाएंगे।
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सुबह 10 बजे जैैसे ही बैंक खुला, क्षणभर में वह हादसे का शिकार हो गए। रामनाथ की मौत की सूचना घर पहुंची तो लोग चीखने-चिल्लाने लगे। अस्पताल में भर्ती बहू बदहवाश हो गई। आसपास के लोग उनको संबल देने में लगे रहे। बेटों का कहना था कि अब उनकी देखरेख कौन करेगा?
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