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रास नहीं आ रही बंदिशें, किशोर ढूंढ रहे ‘आजादी’

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लड़के के साथ कुकर्म - फोटो : demo pic
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देवरिया। इसे बस उम्र का फेर कहें या बदलते सामाजिक परिवेश का असर। किशोर उम्र के बच्चे बहक रहे हैं। किसी को घरवालों की टोका-टाकी पसंद नहीं है तो किसी को अपने सपनों का जहां चाहिए। बंदिशें तोड़कर वह खुलकर जीना चाहते हैं, फिर परिणाम चाहे जो भी हो। हाल के दिनों में सामने आई कई घटनाएं किशोरमन में हो रहे बदलावों को स्पष्ट कर रहे हैं। पिछले तीन माह के आंकड़ों पर ही गौर करें तो जिले से करीब एक दर्जन किशोर घर या आश्रय स्थल छोड़कर भाग गए। इनमें ज्यादातर तो वापस भी आए, जबकि कुछ अब भी लापता हैं। वापस लौटे बच्चों ने पहले अपहरण या भगा ले जाने की कहानी बनाई और फिर सख्ती दिखाने पर मौज मस्ती के लिए भागने की हकीकत सामने आई। आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं। हमारा-आपका बच्चा भी ऐसे दुष्प्रभावों की चपेट में न आए, इसके लिए उनका विशेष ख्याल रखने की जरूरत है। उनकी आदतों पर निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता है। रोजमर्रा की व्यस्तताओं में से अपने बच्चों के लिए भी समय निकालना होगा। सिर्फ टीवी, मोबाइल, गेम के भरोसे छोड़ने की बजाए उनके साथ बैठकर वक्त बिताने की जरूरत है। उनकी मानसिक दशा को समझकर अभी से सही दिशा में नहीं ले गए तो फिर भविष्य मुश्किल में होगा।
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केस एक
खुखुंदू थानाक्षेत्र के भीटा भरौली गांव से 10 जनवरी को सातवीं कक्षा का एक छात्र लापता हो गया। वह घर से स्कूल जाने के लिए निकला, लेकिन वहां नहीं पहुंचा और ना ही घर लौटा। परेशान घरवालों की शिकायत पर पुलिस ने खोजबीन की तो वह अगले दिन खुद घर पहुंचा और अपहरण का प्रयास किए जाने की बात सुनाई। हालांकि बाद में पुलिस की पूछताछ में मामला कुछ और ही निकला।

केस दो:
11 फरवरी को खुखुंदू थानाक्षेत्र के दो बच्चे एक साथ लापता हो गए। इसमें एक कम्हरिया गांव निवासी कक्षा-चार तो दूसरा पड़री बाजार का कक्षा-तीन का छात्र है। दोनों दोस्त थे और एक साथ बाजार घूमने की बात कह कर घर से निकले। 30 घंटे तक घरवाले और पुलिस उन्हें ढूंढती रही। सर्विलांस की मदद से अगले दिन देर शाम उन्हें गोरखपुर से पकड़ा गया। दोनों बच्चे घूमते हुए गोरखपुर चले गए थे।
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केस तीन:
भलुअनी के चाय विक्रेता का बेटा 19 मार्च को घर से स्कूल के लिए निकला और भागकर लखनऊ पहुंच गया। उसने पांच लाख रुपये की फिरौती का एसएमएस भेजकर घर और पुलिसवालों की मुश्किलें बढ़ा दी। सात दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद पुलिस ने हसनगंज (लखनऊ) से बरामद किया। छानबीन में सामने आया कि घरवालों की रोक-टोक से आजिज आकर अपनी मर्जी से जीने के लिए लखनऊ चला गया था।

केस चार:
इसी माह आठ तारीख को राजकीय बालगृह बालक से चार बच्चे खिड़की तोड़कर भाग गए। तीन बच्चे ट्रेन पकड़कर गोरखपुर की ओर रवाना हुए, जबकि एक ने वाराणसी की राह पकड़ ली। आजमगढ़ से पकड़े गए बच्चे ने पूछताछ में बताया कि वह बंदिशों से परे खुलकर जीना चाहते थे। इसी उम्मीद में वह बाहर गए थे। तीन अन्य किशोरों की तलाश अभी भी जारी है।

बच्चों को दोस्त बनाएं, उनसे खुलकर बात करें
संत विनोबा पीजी कॉलेज में मनोविज्ञान विभाग की प्रवक्ता डॉ. नाजिश बानो का कहना है कि किशोरावस्था में अनेक शारीरिक और मानसिक बदलाव होते हैं। ऐसे वक्त में ही बच्चों को सही दिशा की जरूरत होती है। यह तभी होगा, जब अभिभावक उनसे घनिष्ठता बढ़ाएंगे। दोस्त बनकर उनके साथ बैठें, बात करें, उनकी मनोदशा को समझें। आज एकाकी परिवारों में बच्चों को संयुक्त परिवारों वाला स्नेह, दादा-दादी का सानिध्य, संस्कार नहीं मिल पा रहा। माता-पिता खुद को अपने कामों में व्यस्त कर बच्चों को टीवी, मोबाइल और कार्टून फिल्मों के भरोसे छोड़ देते हैं। इनसे बच्चा क्या सीखता है, इस पर उनकी निगरानी नहीं होती। अपने बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी खुद अभिभावकों को निभानी होगी।

किशोरियों को भगाने के मामले भी कम नहीं
बदलाव का असर सिर्फ लड़कों में ही नहीं है। इस उम्र की लड़कियां भी ज्यादा पीड़ित हैं। थानों में नाबालिग किशोरी को बहला-फुसलाकर भगा ले जाने के मामले आए दिन दर्ज हो रहे हैं। इनके पीछे भी किशोरावस्था में अभिभावकों की सही निगरानी नहीं होना ही मुख्य वजह मानी जा रही है।

जागरूक किए जा रहे बच्चे : जेपी तिवारी
जिला बाल संरक्षण अधिकारी जेपी तिवारी के मुताबिक बच्चे-किशोर अपनी भावनाओं को घरवालों से बताएं, इसके लिए उन्हें जागरूक किया जा रहा है। लगातार ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें सही और गलत का बोध कराने का प्रयास किया जा रहा है। खासतौर से लड़कियों को कानूनी प्रावधान भी बताए जा रहे हैं। अभिभावकों को भी अपने स्तर से यह प्रयास करने की जरूरत है।
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