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पंद्रह दिन से फंसी थी बैट्री, दर्द से परेशान था बच्चा
कान में अंदर होने से चीरा लगाकर निकालना पड़ा
देर होने पर गल सकती थी कान की हड्डी
संवाद न्यूज एजेंसी
देवरिया। मेडिकल कॉलेज में बुधवार को बच्चे के कान में 15 दिन से फंसी कलाई घड़ी में लगने वाली बैट्री को निकाला गया। इसके लिए चीरा लगाना पड़ा। वह दर्द से परेशान था। इसके निकालने में देर करने पर कान की हड्डी के गलने की आशंका थी। निजी अस्पताल में 18 से 20 हजार रुपये खर्च करने पड़ते, जबकि अस्पताल में धन नहीं खर्च करना पड़ा।
महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज में सुविधाएं बढ़ रही हैं। नाक, कान, गला विभाग में आए दिन कुछ नया किए जा रहे हैं। पड़ोसी प्रांत बिहार के गोपालगंज जिले के कटेया थाना क्षेत्र के बैरिया गांव निवासी हरिओम (10) पुत्र पुरुषोत्तम चौहान के खेलते समय कान में घड़ी में लगने वाली बैट्री चली गई। उसे निकालने में वह अंदर जाकर फंस गई। कान में तेज दर्द होने पर इसकी जानकारी परिजनों को हुई। परिजन उसे लेकर शनिवार को मेडिकल कॉलेज पहुंचे। ईएनटी विभाग में डॉ. प्रदीप गुप्ता ने परीक्षण किया तो कान में काफी अंदर सख्त चीज फंसी थी। निकालने का प्रयास करने पर उपकरण टेढ़ा हो जा रहा था। ईएनटी रोग विशेषज्ञ ने तीमारदारों से भर्ती करने के लिए कहा। उन्होंने चीरा लगाने की बात कही तो वे राजी नहीं हुए और निजी अस्पताल में चले गए। वहां एक्स-रे, दवा व इलाज कराया, लेकिन आराम नहीं मिला। इसके बाद मंगलवार को फिर मेडिकल कॉलेज पहुंचे। डॉक्टर ने भर्ती कर जांच कराई। इसके बाद बुधवार को सुन्न कर छोटा चीरा लगाकर फंसी बैट्री को निकाला गया तो बच्चे को दर्द से राहत मिल गई। इसके बाद परिजन उसे लेकर चले गए।
डॉ. प्रदीप कुमार गुप्ता ने बताया कि चीरा लगाकर बच्चे के कान से बैट्री निकाली गई। बैट्री में लीथियम, मैग्नीज आक्साइड होता है। उससे केमिकल निकलता है, जो स्कीन पर असर डालने के बाद कान की हड्डी भी गला देता है। समय से इलाज नहीं कराने पर दर्द के साथ कान बहना शुरू हो जाता है। बच्चे के कान में खूंट भी थी। पहले उसे साफ किया गया। चीरा लगाकर क्रोकोडाइल फारसेस से बैट्री निकली गई। उसका स्कीन पर असर पड़ रहा था। काला धब्बा हो गया था। कान में दिक्कत होने पर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क कर इलाज कराना चाहिए।
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बच्चे के कान में फंसी बैट्री को निकाला गया है। इसके लिए परिजनों को धन नहीं खर्च करना पड़ा। जबकि निजी अस्पताल में अधिक कीमत चुकानी पड़ती। अस्पताल में मरीजों को बेहतर सुविधा देने के प्रयास किए जा रहे हैं।
-डॉ. एचके मिश्रा, सीएमएस