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Deoria News: रुद्रपुर के सहनकोट परिक्षेत्र से मिली 2500 वर्ष पुरानी मुद्रा

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सहनकोट परिसर में मिले प्राचीन पंचमार्क सिक्के
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रुद्रपुर के सहनकोट परिक्षेत्र में छुपा है दो हजार वर्ष का इतिहास
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मिट्टी खोद रहे मजदूरों को मिला पंचमार्क सिक्का
भारत में पंचमार्क सिक्कों से हुआ था मुद्रा का चलन
संवाद न्यूज एजेंसी
रुद्रपुर। करीब पांच किलाेमीटर में फैला रुद्रपुर का प्राचीन और ऐतिहासिक ध्वस्त किला अपने अंदर दो हजार वर्ष का इतिहास समेटे है। यहां के सहनकोट परिक्षेत्र से दुर्लभ सिक्के मिले हैं। यह मुद्राएं ढाई हजार वर्ष पुरानी बताई जा रही हैं। प्राचीन इतिहास और मुद्रा के जानकारों के अनुसार इन्हें पंचमार्क सिक्का कहा जाता है।
सहनकोट परिक्षेत्र का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इससे पहले भी इस क्षेत्र से दुर्लभ मूर्तियां और शस्त्रागार मिल चुका है। पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित इस क्षेत्र से समय-समय पर दुर्लभ और प्राचीन वस्तुएं मिलती रहती हैं। पांच दिन पहले इस क्षेत्र में मिट्टी खोद रहे मजदूरों को कुछ सिक्के मिले। मजदूर उन सिक्कों को नगर के एक स्वर्णकार के यहां परख कराने ले गए। स्वर्णकार के माध्यम से सिक्कों पर शोध करने वाले प्राचीन इतिहास के जानकार डॉ. शैलेंद्र मिश्र ने मजदूरों को कुछ रकम देकर सिक्कों को ले लिया।
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उन्होंने कहा कि भारत में सबसे पहले मुद्रा का चलन पंचमार्क सिक्कों से शुरू हुआ था। यह चांदी और कॉपर के सिक्के हैं। इन पर पांच तरह की आकृतियां बनी हैं। पांच तरह के चिह्नों की वजह से इसे पंचमार्क सिक्का कहा जाता है। इन सिक्कों पर सूर्य, विभिन्न जानवर, पेड़ों और पहाड़ियों के चित्र छापे जाते थे। तब हर जनपद में अलग-अलग तरह के सिक्के होते थे। सहनकोट क्षेत्र से मिला सिक्का पंचमार्क सिक्का है। यह सबसे प्राचीन मुद्रा है।

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. रजवंत राव ने कहा कि सहकोट परिक्षेत्र से मिला सिक्का भारत की पहली मुद्रा लग रही है। यह करीब ढ़ाई हजार वर्ष पुराना है। पहले भारत में सामान के बदले सामान लेने और देने का चलन था। भारत की पहली मुद्रा पंचमार्क सिक्का बनी। हर सिक्के पर अलग-अलग ठप्पा होता था। यह छोटे-छोटे गणराज्यों में उनके शासकों की ओर से जारी किया जाता था।
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प्राचीन इतिहास का खजाना है सहनकोट क्षेत्र, पहले भी मिला था आयुध भंडार और मूर्तियां
रुद्रपुर। दुग्धेश्वरनाथ मंदिर के पीछे सहनकोट परिक्षेत्र का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। यहां पहले भी दुर्लभ मूर्तियां और आयुध भंडार मिल चुका है। इस क्षेत्र से भगवान गणेश, भगवान बामन और शिव पार्वती की नृत्य करते मुद्रा में मिली मूर्ति दुग्धेश्वरनाथ मंदिर परिसर में स्थापित की गई है। यहां से छठी शताब्दी ईशा पूर्व में अजातशत्रु के काल में प्रयोग होने वाले रथ मूसल और महाशिला कंटक नामक हथियारों के गोले प्राप्त हुए थे। पत्थर के बने भारी मात्रा में गोला किसान को खेत की जुताई करते समय मिला था। इन गोलों से दुश्मन सेना के महारथियों के रथ को तोड़ा जाता था।
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