चित्रकूट। आधुनिक जीवन में ऋषि परंपरा विषय को लेकर अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी में दूसरे दिन ऋषि परंपरा पर चर्चा की गई। इसमें बताया कि ऋषि परंपरा की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। उन्हें जीवन में उतारना चाहिए।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय के अष्टावक्र सभागार में रविवार को संगोष्ठी का जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने शुभारंभ किया। तुलसी पीठ के उत्तराधिकारी आचार्य रामचंद्र दास ने ऋषि परंपरा का महत्व बताते हुए कहा कि आधुनिक युग में ऋषि परंपरा की समस्त शिक्षाएं मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनके माध्यम से मानव का कल्याण हो सकता है। ऋषि जंगलों में रहते हुए समाज की भलाई के लिए निस्वार्थ रूप से काम करते थे। जो भी शिक्षा दी जाती थीए वह मानव के हित के लिए होती थी। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में ऋषि परंपरा को बनाए रखने में जगदगुरु स्वामी रामभद्राचार्य जी का योगदान है। उनके दिखाएं गए मार्ग पर ही दिव्यांग राज विश्वविद्यालय में पढ़ाई कराई जा रही है।
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय लखनऊ के प्रो. रामसलाही द्विवेदी ने कहा कि भारत की भूमि ऋषि परंपरा की उर्वरा शक्ति के रूम में है। प्रत्येक शिक्षा संस्थान में अनिवार्य रूप से इसका निर्वाहन किया जाए। दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. लक्ष्मी निवास पांडेय ने कहा कि संस्कृत भाषा में भी जगद्गुरु ने कई किताबे लिखी है।गोष्ठी के दौरान सप्त ऋषियों एवं श्री रामचरितमानस पर आधारित एक कलाकृति का भी लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का संचालन उज्जैन के डॉ. तुलसीदास परौहा ने किया।
इस मौके पर डॉ. गोपाल कुमार मिश्र, डॉ. महेंद्र कुमार उपाध्यायए,डॉ. निहार रंजन मिश्र, डॉ. विनोद कुमार मिश्र, डॉ. किरण त्रिपाठी, डॉ. अमित अग्निहोत्री, डॉ. गुलाबधर, डॉ. शशिकांत त्रिपाठी, डॉ. प्रमिला मिश्रा, डॉ. मनोज कुमार पांडेय आदि ने विचार व्यक्ति किए।