फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

झोला छाप डॉक्टर के इलाज से मासूम की मौत

Sun, 07 May 2017 11:21 PM IST
चित्रकूट
विज्ञापन
मौके पर पु‌‌ल‌िस। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
चित्रकूट। बदले सीजन में डायरिया के साथ ही अब बुखार का भी प्रकोप बढ़ने लगा है। तीन माह के नवजात को बुखार की शिकायत पर झोलाछाप से इलाज कराना परिवार को महंगा पड़ गया। हालत नाजुक होने पर जब उसे जिला अस्पताल लाया गया तो वहां कुछ देर के इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
विज्ञापन


 शिवरामपुर क्षेत्र के रैपुरवामाफी निवासी मिल्ला के  तीन महीने का पुत्र बसंत कई दिनों से बुखार से पीड़ित था। परिजनों के अनुसार उसका इलाज शिवरामपुर में एक झोलाछाप डॉक्टर से इलाज करा रहे थे। रविवार को उसकी तबियत अधिक बिगड़ गई जिससे उसे इलाज के लिए जिला चिकित्सालय लाकर भर्ती कराया।
जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गयी।
    जिला अस्पताल के डॉ. विष्णु गुप्ता ने बताया कि मृतक बच्चे को तेज बुखार था जिसको आज ही इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। इसके पहले दूसरे पहले अन्य स्थान पर इलाज कराया जाता रहा है। संभावना है कि इलाज सही तरीके से न होने से हालत बिगड़ गई थी।
विज्ञापन


जिला अस्पताल में कुछ देर बाद ही उसकी मौत हो गई। उधर मृतक के पिता ने कहा कि झोला छाप से इलाज के कारण उसके पुत्र की मौत हुई है लेकिन वह उस डॉक्टर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगा।

पांच बहनों के बीच था अकेला भाई
शिवरामपुर। रैपुरवा निवासी मिल्ला के तो छह संताने थी। पंाच पुत्रियों के बाद उसे तीन माह पूर्व ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। रविवार को उसकी मौत के बाद पूरे गांव में शोक व्याप्त रहा।
 एक महीने में दूसरी घटना-
 जिला अस्पताल में डॉक्टर बुखार पीड़ित मासूम की मौत के लिए चाहे जिसे दोषी ठहराएं लेकिन यह एक माह के अंदर दूसरी घटना है कि जब इलाज के दौरान बुखार व डायरिया पीड़ित की मौत हुई है। इस घटना के बाद से जिला अस्पताल के इंतजाम पर भी सवाल उठते हैं। गौरतलब है कि कुछ दिनों पूर्व जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय के  स्नातक के नि:शक्त छात्र को डायरिया पीड़ित होने पर इसी अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन दूसरे दिन अस्पताल में ही उसकी मौत हो गई थी। अब बुखार से पीड़ित मासूम की मौत हुई। पूरे मामले में सीएमएस डॉ.एनके गुप्ता ने बताया कि बुखार व डायरिया से निपटने के लिए तो पर्याप्त डॉक्टर व दवाएं हैं लेकिन इस बार परिजनों ने पहले झोला छाप से इलाज कराया था जिससे बालक की हालत बेहद नाजुक हो गई थी और बिल्कुल अंतिम समय पर ही यहां लाया गया था। जिससे उसे बचाया नहीं जा सका।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें