चित्रकूट। बस स्टैंड कर्वी निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माधव प्रसाद रिछारिया आजाद की नजदीकियों के कारण अंग्रेजों को निशाने पर आ गए थे। इसके लिए उन्हें दो बार जेल भी भेजा गया। यहां तक सरकारी शिक्षक की नौकरी भी छूट गई।
मूल रूप से झांसी जिले के बरुवा सागर निवासी माधव प्रसाद रिछारिया अंग्रेजी शासन काल में सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। गांव से छह किलोमीटर दूर ओरछा में उन दिनों चंद्रशेखर आजाद का आना-जाना लगा रहता था। भाई रामसेवक रिछारिया पहले से ही आजादी की लड़ाई में शामिल हो चुके थे। ऐसे में माधव प्रसाद भी अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ लड़ाई में उतर पड़े।
बेटे राकेश रिछारिया के मुताबिक उस समय झांसी छावनी थी। पिता अंग्रेजों के आफिसों के फोन की केबल काट देते थे, ताकि अंग्रेज किसी तरह रणनीति पर उच्च अफसरों से बातचीत न कर सकें। इसके कारण पिता को पहले छह माह की सजा हुई। सजा काटने के बाद भी उनका मनोबल नहीं टूटा। माधव प्रसाद को एक बार फिर पुलिस की कार्रवाई में सवा साल की सजा हुई तो वह फरार हो गए। इस पर घर की कुर्की कर ली गई। बाद में सजा काटने के बाद माधव प्रसाद गांधीवादी हो गए और आंदोलनों में हिस्सा लेने लगे। देश आजाद होने के बाद उन्हें फिर से नौकरी पर बहाल कर दिया गया। सन 1966 में चित्रकूट में तबादला होने के बाद यहां जातिवाद के खिलाफ अभियान में शामिल हुए। मंदाकिनी किनारे पौधरोपण में उनकी बड़ी भूमिका रही। बस अड्डे के पास बड़ा नाला बंद कराकर आबादी बसाई। पत्नी यशोदा देवी ने उनका पूरा साथ दिया। दो पुत्र राकेश रिछारिया व अवधेश रिछारिया हैं। एक लड़की सुशीला हैं, जिनकी शादी झांसी जिले मेें हुई है। सेनानी की मृत्यु 10 सितंबर 1999 को हुई।
सेनानी परिवारों का ध्यान नहीं देती सरकार
अवधेश रिछारिया के शिक्षक पुत्र अजय रिछारिया का कहना है कि बाबा के रहते समय डीएम के यहां बुलाकर सम्मानित किया जाता था। उनकी मृत्यु के बाद सम्मान तो दूर कोई हालचाल लेने वाला नहीं है। नगर पालिका कोठी तालाब के बगल में पार्क का निर्माण कराया जा रहा है। उन्होंने इस पार्क का नाम माधव प्रसाद रिछारिया के नाम से करने की मांग उठाई है।