धानापुर। क्षेत्र के बूढ़ेपुर गांव में चल रहे चतुर्मास यज्ञ के दौरान मंगलवार को जीयर स्वामी ने कहा कि महर्षि पतंजलि के अनुसार सभी मनुष्य की नासिका में दो छिद्र हैं। नासिका के दायें छिद्र को सूर्य व बायें छिद्र को चंद्र स्वर कहा जाता है। इसी को इंग्ला और पिंग्ला के नाम से भी जाना जाता है। इन दोंनो छिद्रों से सांस आती व जाती है। ये दोनों छिद्र जहां सुषुम्ना नाड़ी में मिलते है वहां इनको रोक कर परमात्मा का ध्यान करना ही हठ योग कहलाता है। कहा कि राजयोग के अधिकारी सभी होते हैं। यह छह लेन वाली सड़क है। परमात्मा का अपने शरीर में पांच स्थान पर ध्यान करने की बात बताई गई है। पहला त्रिकोण में जिसे कुंडलिनी जागरण कहा गया है। दूसरा नाभी से दस अंगुल छोड़ कर परमात्मा का ध्यान किया जा सकता है। तीसरा कंठ के पास, चौथा ललाट से नीचे और पांचवा तारू के पास अर्थात ब्रह्मरंध्र में बताया गया है। कथा आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब वामन भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगे और दो ही पग में पुरा लोक माप लिया तब तीसरे पग के लिए कोई स्थान ही नहीं बचा था। तब राजा बलि ने वामन भगवान से कहा कि आप जानते थे कि मेरे पास देने के लिए उतनी भूमि नहीं है। उतनी भूमि मांगकर आप अपराधी हुए। हार आपकी हुई है। भगवान वामन ने कहा कि वे हार गए हैं और बलि से अपने लिए दंडमांगा। तब राजा बलि ने कहा कि आप मेरे द्वार के प्रहरी बनें। वामन भगवान ने इसे स्वीकार लिया। कुछ दिन बाद लक्ष्मी जी को पता चला तो राजा बलि के यहां रहने की इच्छा से पहुंचीं। राजा बलि नें अपने यहां उनको रख लिया। जब सावन की पूर्णिमा आई तो लक्ष्मी जी ने कहा कि यहां उनका कोई भाई नहीं है। वे रक्षा सूत्र किसे बांधे। इस पर राजा बलि रक्षा सूत्र बंधवाने को तैयार हो गए। राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर माता लक्ष्मी ने भाई का दर्जा दिया। राजा बलि ने कहा कि बहन क्या मांगती हो तो लक्ष्मी जी ने कहा कि अपने द्वार का पहरेदार मुझे सौंप दो। इस प्रकार वामन भगवान को माता लक्ष्मी ने मुक्त कराया।