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Chandauli News: टैंकर का पानी नहीं आने से दो दिन नहीं जले घरों के चूल्हे

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आनंद सिंह
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केल्हड़िया (नौगढ़)। जंगलों के बीच बसे नौगढ़ के केल्हड़िया गांव में दो दिन तक सिर्फ इसलिए चूल्हे नहीं जले, क्योंकि प्रशासन यहां टैंकर से पानी भेजना ही भूल गया। चंदौली जिले के इस सबसे दुर्गम इलाके में कोल आदिवासी समुदाय के लोग सात पीढ़ियों से खेती-किसानी कर जीवन बसर कर रहे हैं। इस गांव में करीब 70 लोग रहते हैं। इनके लिए साफ पानी आज भी सपना है। पेयजल संकट के चलते कई आदिवासी अपने मवेशियों को लेकर मूसाखांड़ डैम की तलहटी में चले गए हैं।
नौगढ़ ब्लाक मुख्यालय से करीब 44 किमी दूर चौतरफा पहाड़ियों और जंगलों के बीच केल्हड़िया गांव बसा है। यहां पेयजल का गंभीर संकट है। 'हर घर जल योजना' कोसों दूर है। आजादी के 75 साल गुजर गए, लेकिन इस गांव में पीने के पानी का इंतजाम नहीं हो सका। 24 मई 2023 के बाद यहां टैंकर का पानी नहीं पहुंचा। दो दिनों तक आदिवासी इंतजार करते रहे, लेकिन इनकी गुहार न तो ग्राम प्रधान ने सुनी और न ही किसी सरकारी नुमाइंदे ने। नतीजा, आदिवासियों के घर चूल्हे नहीं जले। काफी जुगत के बाद तीसरे दिन दोपहर बाद पानी पहुंचा। पहाड़ के जिस सोते (चुआंड़) से केल्हड़िया गांव के लोगों की प्यास बुझा करती थी, वह अब सूख चुका है। पश्चिमी छोर पर बने उस चेकडैम में भी धूल उड़ रही है, जिसमें आदिवासियों के मवेशी पानी पीते थे। इनकी प्यास बुझाने के लिए यहां हैंडपंप भी लगाए गए और सबमर्सिबल पंप लगाने के लिए दो स्थानों पर डीप बोरिंग भी हुई, लेकिन सब बेकार। गांव के उत्तरी छोर पर सिंचाई के लिए बने कुएं के गंदे पानी में औरतें नहाती हैं और कपड़े-बर्तन धोती हैं। केल्हड़िया के आदिवासी करीब एक किमी दूर नाले से पीने का पानी लाते हैं। चुआंड से गिरकर नाले में आने वाले पानी से आदिवासियों और जंगली जानवरों की भी प्यास बुझती है। केल्हड़िया के लोग जब भी पानी लेने जाते हैं तो ग्रामीणों की एक टोली लाठी-डंडे लेकर उनके साथ जाती है। नाले के आसपास अक्सर भालुओं के झुंड और तेंदुए देखे जाते हैं। केल्हड़िया के 86 वर्षीय घुरहू कोल कहते हैं, 'हम ऐसा पानी पीने के लिए विवश हैं, जिससे मवेशी भी मुंह फेर लेते हैं। हमारी लाचारी है कि इसी पानी से गुजारा करना पड़ रहा है। गर्मी आते ही हाहाकार मच जाता है और जून के आखिर तक त्राहि-त्राहि मची रहती है। हम अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए कम खाना खिलाते हैं ताकि ज्यादा प्यास न लगे। पिछले साल सूखे के चलते सभी नाले सूख गए हैं और पास की कर्मनाशा नदी भी सूखने के कगार पर है। खेती-किसानी बर्बाद हो रही है। धान की नर्सरी लगाने का वक्त है, लेकिन केल्हड़िया के लोग बादलों का इंतजार कर रहे हैं।'
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भूख-प्यास से बेहाल कुंती देवी कहती हैं, 'हम तो नहाना ही भूल गए हैं। पिछले एक हफ्ते से पीने का साफ पानी नसीब नहीं हो रहा है तो नहाएं कैसे? छह जून को हमारी बेटी की शादी है। पानी का इंतजाम नहीं हुआ तो हम बरातियों को क्या खिलाएंगे और पिलाएंगे? प्रधान फोन नहीं उठा रहे हैं। हमने सोच लिया है कि हम थाने पर गुहार लगाएंगे, ब्लाक पर धरना देंगे। दूसरा और कोई उपाय नहीं सूझ रहा है।'
लगातार दो दिनों तक भूखी-प्यासी बैठीं लीलावती कहती हैं, 'हमारे दो बेटे और दामाद सुबह से ही पानी लेने जंगल की ओर निकले थे, लेकिन 11 बजे तक उनका अता-पता नहीं है। चुआड़ सूख गया और अब तो नदी-नालों में भी पानी नहीं बचा है। गांव के कई बच्चे रिश्तेदारों के यहां चले गए हैं और मवेशी मूसाखाड़ के जंगल में। हमारे लिए पीने का पानी सबसे बड़ा दुख है। गंदा पानी पीकर लोग बीमार पड़ने लगे हैं। अफसरों के यहां कई बार गुहार लगाई गई, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है।' (संवाद)





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हर घर जल योजना गुम
केल्हड़िया। आदिवासी बहुल नौगढ़ इलाके में पेयजल संकट दूर करने के लिए 'हर घर जल' योजना का अता-पता नहीं है। इस प्रखंड में शुद्ध पेयजल की आपूर्ति के लिए करीब 250 करोड़ की योजना को मंजूरी मिली थी। भैसोढ़ा बांध के पानी को शोधित करने के बाद करीब छह सौ किलोमीटर पाइप लाइन से 93 गांवों के 12 हजार 301 घरों तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य है। खंड विकास अधिकारी सुदामा यादव कहते हैं कि हर घर जल योजना से करीब 75 हजार लोगों को लाभान्वित किया जाएगा। फिलहाल पेयजल संकट से जूझ रहे इलाकों में 37 टैंकरों से जलापूर्ति की जा रही है।
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बेटों की शादी करने में घिस जाते हैं जूते
केल्हड़िया। नौगढ़ प्रखंड का केल्हड़िया वह बदनसीब गांव है जहां बेटों की शादी के लिए लोगों को जूते घिस जाते हैं। केल्हड़िया के अरविंद कोल और पास के पंडी के रामकृत खरवार कहते हैं, दोनों गांवों में लड़कों की शादी किसी चुनौती से कम नहीं है। नौगढ़ के सभी गांवों में लोगों को पता है कि दोनों गांवों में पीने के पानी की जबर्दस्त किल्लत है। इसीलिए अपनी बेटियों की यहां शादी करने में हिचकते हैं। केल्हड़िया और पंडी ऐसे गांव हैं जहां औरतों और बच्चों को हर रोज दूर से पानी ढोना पड़ता है और उनका काफी वक्त इसी में निकल जाता है।
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