अपनी बेटी के भी क्षय रोग से पीड़ित होने के दौरान आर्थिक तंगी और सामाजिक उपेक्षा के दंश ने लाल बहादुर को संकल्प से भर दिया। उन्होंने ठान लिया कि टीबी मरीजों के उपचार में मदद करेंगे। वर्ष 2006 से अब तक वह 460 टीबी मरीजों की मदद कर चुके हैं। उनकी लगन को देखते हुए क्षय रोग विभाग ने उन्हें जनवरी में बलगम ट्रांसपोर्टर की जिम्मेदारी सौंपी।बलगम ट्रांसपोर्टर के रूप में लाल बहादुर लोगों से अपने अनुभव साझा करते हैं। टीबी के प्रति फैली भ्रांतियों को दूर करते हैं। क्षय रोगियों को इलाज के लिए प्रेरित करते हैं। सदर बबुरी ब्लॉक के नगई गांव निवासी लाल बहादुर (55)ने बताया कि उनको मई 1984 में टीबी हुई थी। लगातार 9 महीने तक इलाज करके वे स्वस्थ हो गए। वर्ष 2000 में बेटी को टीबी हो गई। लगातार 7 माह तक दवा दिलाकर बेटी को स्वस्थ किया। हमें और हमारी बेटी को टीबी होने से इस बात जानकारी हो गयी कि यह एक संक्रामक बीमारी है। टीबी की दवा सेवन अवधि पूर्ण होने तक करना चाहिए। सफाई और पौष्टिक आहार पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरी जानकारी में आने के बाद इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को नियमित दवा मिलेगी और लगातार उसे इलाज के लिए प्रेरित किया जाएगा।