मोहनिया। ‘चाह किसी घूंघट वाली के हाथों का दर्पण बन जाऊं, या काजल वाली आंखों का, गिरता हुआ सपन बन जाऊं। मैं तो लोहा जनम-जनम का, एक अरज मेरी है तुमसे, तुम पारस पत्थर हो मुझको छू दो तो कंचन बन जाऊं।’ वरिष्ठ कवि और गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र की इन पंक्तियों पर पूरा सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। आवर्तन मंच की ओर से रविवार को पंडित मदन मोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर कैमूर के लिच्छवी भवन में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में देश के वरिष्ठ कवियों ने काव्य रस की गंगा बहाई। कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने आगे पढ़ा-‘जिसे चाहा नहीं तुमने कभी वो चैन पाया क्या, ये सांसें तेज चलती हैं, किसी का दिल चुराया क्या। जरूरत क्या तुम्हारे रूप को शृंगार करने की, किसी हिरनी ने अपनी आंख में काजल लगाया क्या।’ कवि फजीहत गहमरी ने ‘अपनी दिलकश अदाओं से निमंत्रण मूक देती है, गिरा के हुस्न की बिजली, मेरा दिल फूंक देती है। करूं मैं किस तरह से प्यार का इजहार तुम बोलो, मैं उसको फूल देता हूं, वो मुंह पर थूंक देती है।’... से खूब तालियां बटोरी। युवा कवि रत्नेश चंचल ने-‘चिल्लाओ, सर पीटो, ईमान की बात करो, तुम्हारी कौन सुनेगा। उठाए बोझ कंधे पर पूरे जमाने की बात करो, तुम्हारी कौन सुनेगा। यहां सिद्धांत की बखिया उधेड़ी रोज जाती है, गीता की, कुुरान की, भगवान की बात करो, तुम्हारी कौन सुनेगा।’ पढ़कर वाहवाही लूटी। वहीं कुमारी सुमन की कविता ‘पढ़े-लिखे तो बेरोजगार बैठे हैं पर यहां गुंडे मवालियों की सरकार होती है।’ को लोगों ने पसंद किया। इनके अलावा रास बिहारी पांडेय, निशा राय, मनमोहन मिश्र, मिथिलेश गहमरी, डॉ. धर्मप्रकाश मिश्र और सोनी सुगंधा ने भी काव्य पाठ किया। इस दौरान विधान परिषद के सदस्य संतोष सिंह, पूर्व विधायक रिंकी रानी पांडेय, संतोष कुमार पांडेय, रानू दुबे, अभिषेक तिवारी, शैलेंद्र चौबे, नित्यानंद तिवारी, प्रितांशु आदि मौजूद थे। संचालन युवा कवि रत्नेश चंचल ने किया।