कंदवा। आग की लपटों से हुए नुकसान की भरपाई को लेकर मरहम लगाने के सरकारी प्रावधान तो हैं मगर इसमें नियम इतने हैं कि इनको निभाते- निभाते ही मुआवजे की उम्मीद ठंडी पड़ जाती हैं। किसी मामले में राजस्व विभाग तो किसी में मंडी समिति की भूमिका अहम होती है। कई मामलों में दोनों विभागों की भी जांच रिपोर्ट आधार बनती है। इसकी प्रक्रिया ही इतनी जटिल है कि प्रभावितों को तत्काल आर्थिक मदद मिलने की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं है। गर्मी में गेहूं की मड़ाई काम तेजी से चल रहा है। वहीं कई जगहों पर आग लगने की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। खेतों में खड़ी फसल जलने से किसान परेशान हैं। अगलगी से हर साल किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। अब तक जनपद में कम्हरिया सहित कई गांवों के किसानों की सैकड़ों एकड़ गेंहूं की तैयार फसल आग की भेंट चढ़ चुकी है और किसान मुआवजे की राह देख रहे हैं। अब सरकारी मुआवजे का मरहम किसानों को कब मिलेगा पता नहीं। आग, पानी, ओलावृष्टि और सूखा को ही दैवीय आपदा में शामिल किया गया है जबकि अन्य कारणों से फसल बर्बादी को मुआवजा की श्रेणी में नहीं रखा गया है। शासन की ओर से मुआवजे की न्यूनतम और अधिकतम धनराशि भी पहले से ही निर्धारित कर दी गई है।