कंदवा। दान, दया, धर्म और कर्म के मध्य ही व्यक्ति का जीवन क्रम चलता है। सतयुग में भक्त को कठिन तप से परमात्मा के दर्शन होते थे, लेकिन कलयुग में केवल भगवान का नाम जपने, दया, दान और सत्संग करने से ही मनुष्य का कल्याण हो जाता है। यह विचार शनिवार को चिरईगांव में चल रहे चातुर्मास यज्ञ के दौरान त्रिदंडी स्वामी के शिष्य सुंदर राज जी महाराज ने व्यक्त किए। कहा कि कलयुग में व्यक्ति सरलता से ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा की संसार में दो प्रकार के लोग सुखी हैं। एक वह जो विरक्त हैं, जिसने अपनी इच्छाओं को मार दिया है और संसार से कुछ नहीं मांगते हैं। दूसरा वह है जिसने अपने आप को साध लिया है और वह अब भगवान से भी कुछ लेने की इच्छा नही रखते हैं। शेष सब दुखी हैं। उनको संसार दुखालय ही प्रतीत होता है। जबकि भगवान किसी को भी दुखी नहीं करते हैं। व्यक्ति के कर्म ही सुख और दुख के कारण हैं। कहा कि प्रत्येक मनुष्य को जीवन में दान पुण्य अवश्य करना चाहिए। जैसे समय बीतने पर अशुद्ध भूमि शुद्ध, गंगा स्नान से शरीर और भागवत कथा का श्रवण करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है। उसी प्रकार कलयुग में दान करने से धन और अन्न शुद्ध हो जाता है। उन्होंने कहा कि जीवन में अच्छी संगति से अच्छे गुण और बुरी संगति से दुर्गण आते हैं। बुरे धन और अन्न उपयोग करने से अनेक दु:ख और बीमारियां आती हैं। कहा कि दान देने से अन्न और धन शुद्ध होता है। दोनों को शुद्ध करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को अपनी नेक कमाई से दान-पुण्य जरूर करना चाहिए। इस दौरान प्रगति सिंह, कुमकुम, आकांक्षा सिंह, वैशाली सिंह, चाहत पांडेय, गोपाल प्रसाद खरवार, मृत्युंजय सिंह, राजवंश सिंह, बैजनाथ पांडेय, नरेंद्र सिंह, कुंदन रहे।