धानापुर। गृहस्थ जीवन में रहते हुए अगर सुख उपलब्ध नहीं हैं, तो अपने को सच्चा गृहस्थ नहीं मानना चाहिए। चार भाईयों में एक भाई को भी संतान हो तो अन्य तीनों भी पुत्र के अधिकारी हो जाते हैं। गृहस्थ आश्रम के लिए कोई निर्धारित वस्त्र नहीं है। वे किसी तरह का मर्यादित वस्त्र धारण कर सकते है। वहीं संत का आचरण और वस्त्र उनके पहचान होते हैं। यह बातें क्षेत्र के बूढ़ेपुर में चल रहे चतुर्मास यज्ञ में शनिवार को जीयर स्वामी ने कहीं। उन्होनें कहा कि धर्म के दस लक्षण है। इनमें धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इंद्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना शामिल हैं। स्वच्छता की चर्चा करते हुए कहा कि स्वच्छता का तात्पर्य बाहरी और भीतरी स्वच्छता से है। भगवान कहते हैं कि जिसका मन निर्मल रहता है उसे ही मैं अंगीकार करता हूं। निर्मल मन जन सो मोहि पावा-मोहि कपट छल छिद्र न भावा। कहा कि स्वच्छ स्थान पर भगवान का वास होता है। सार्वजनिक स्थलों पर मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए। दिन में उत्तर दिशा और रात में दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए। इसका उल्लंघन करने से धन और यश की हानि होती है। गुरु और भगवान का स्मरण करते हुए पूरब मुंह करके स्नान करना चाहिए। कहा कि मनुष्य को तीन तरह का यज्ञ प्रतिदिन करना चाहिए। देव यज्ञ, ऋषि यज्ञ और पितृ यज्ञ। देव यज्ञ से अभिप्राय स्नान-ध्यान कर भगवान का नाम कीर्तन करने से है। वैदिक सद्ग्रंथों का स्वाध्याय और मनन ऋषि यज्ञ है। पितृ यज्ञ से अभिप्राय अतिथि सेवा, गो सेवा व ब्राह्मण सेवा आदि है।