चकिया। पर्वतीय वन क्षेत्रों में मौजूद प्राकृतिक सौंदर्य एवं पर्वतीय क्षेत्रों के बीच हरी-भरी घाटियों के आकर्षण को भुनाने की पर्यटन मंत्रालय की कोशिशें वन कानूनों के आगे बेबस है। इस क्षेत्र में पर्यटन विकास के लिए किसी भी तरह की धनराशि का आवंटन वन विभाग ही कर सकता है। इस वजह से ही पर्वतीय वन क्षेत्रो में पर्यटन विकास धूमिल है। काशी वन्य जीव प्रभाग के तहत जिले के दक्षिणी क्षेत्र में लगभग 74 हजार हेक्टेयर भूमि वन विभाग के आधीन है। इस वन क्षेत्र का 40 प्रतिशत हिस्सा सघन एवं विरल वनों से आच्छादित है। शेष भाग में पहाड़, पठार, जलाशय, नदी, नाले तथा परती क्षेत्र स्थित हैं। काशी वन्य जीव प्रभाग के वन क्षेत्र में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। वर्तमान में अघोषित रूप से यहां दर्जनों पिकनिक स्पाट हैं। वन क्षेत्र में स्थित पर्यटन केंद्रों के विकास का जिम्मा सिर्फ वन विभाग का है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 12 दिसंबर 1996 को दिया गया आदेश पर्यटन विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है। संशोधित वन संरक्षण अधिनियम 1998 एवं संशोधित वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 2000 भी क्षेत्र में पर्यटन विकास को रोकने में सहायक है। वन संपदा के अवैध दोहन को रोकने एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए बनाए गए वन कानून इस क्षेत्र के विकास में किसी अन्य विभाग एवं सरकारी एजेंसी को धन देने से रोकते हैं। वन क्षेत्र में किसी भी तरह का विकास कार्य करने पर केन्द्र तथा राज्य वन विभाग द्वारा एनओसी लिया जाना आवश्यक है। वर्ष 2008 में बसपा सरकार के पर्यटन मंत्री विनोद सिंह तथा उप पर्यटन निदेशक आर विक्रम सिंह एवं सपा सरकार के कार्यकाल के दौरान 2013-14 में तत्कालीन पर्यटन मंत्री ओम प्रकाश सिंह ने वन क्षेत्र का व्यापक दौरा कर इस क्षेत्र में पर्यटन विकास के लिए अनेक घोषणाए की थी, ये घोषणाएं वन कानूनो के आगे बेमानी रही। प्रसिद्ध पर्यटक स्थल राजदरी, देवदरी जलप्रपात, चंद्रप्रभा बांध वन्य जीव बिहार की धरोहर है। औरवाटाड़ जल प्रपात, नौगढ़ बांध, मूसाखाड़ बांध, लतीफशाह, भैसौड़ा बीयर तथा घुरहुपुर बौद्ध बिहार का बड़ा हिस्सा आरक्षित वन क्षेत्र के तहत आता है। इस वजह से यहां के विकास के लिए वन विभाग के अलावा अन्य कोई विभाग विकास नही कराता। इसलिए क्षेत्र में पर्यटन की मूलभूत सुविधाओ को देने में तमाम तरह की दिक्कते हैं। क्षेत्र के पर्यावरण विद् परशुराम सिंह कहते हैं कि क्षेत्र में पर्यटन केंद्रों के विकास से राजस्व वृद्धि होगी और युवाओं को रोजगार मिल सकता है। ऐसे में वन कानूनों में शिथिलता लाने की जरूरत है।