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दस वर्ष में जिले में नहीं हुई औसत बारिश

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मुगलसराय/ चकिया। सीएफसी गैसों के उत्सर्जन से, ओजोन परत में क्षरण के कारण उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग के संकट ने जलवायु परिवर्तन का नया दौर खड़ा कर दिया है। इससे मानसून चक्र अनियमित हो गया है। मानसून सत्र के अनियमित होने के कारण बरसात के आकड़ों में भारी कमी दर्ज की जा रही है। स्थिति यह है कि पिछले 10 वर्षों में जनपद की बरसात ने औसत बरसात का आकड़ा नही छूआ है। जनपद में 1050 एमएम बारिश होनी चाहिए लेकिन एक दशक में कभी भी औसत बरसात की आधी भी बरसात नही हुई है। सिंचाई विभाग के आकड़ों के अनुसार जून से अक्तूबर के बीच के मानसून सत्र में वर्ष 2008 में 572 मिलीमीटर, वर्ष 2009 में 496 मिलीमीटर, 2010 में 507 मिलीमीटर, 2011 में 610 मिलीमीटर, 2012 में 484 मिलीमीटर, 2013 में 527 मिलीमीटर, 2014 में 469 मिलीमीटर, 2015 में 498 मिलीमीटर, 2016 में 522 मिलीमीटर तथा 2017 में 350 मिलीमीटर बरसात दर्ज की गई है। जबकि जनपद के निर्माण के समय औसत बरसात का आकड़ा कृषि विभाग की रिपोर्ट में 1050 मिलीमीटर दिखाया गया है। इस वर्ष भी जुलाई माह में बारिश अपने औसत से अत्यंत कम है। बरसात में लगातार आ रही कमी के कारण मानसून आधारित कृषि क्षेत्र में उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है तथा किसानों द्वारा भूमिगत जल के दोहन का क्रम कई गुना बढ़ गया है। इसका सीधा प्रभाव भूगर्भीय जलस्तर पर पड़ा है। इससे पेयजल संकट की भी स्थिति विकराल रूप से सामने आ रही है। अपेक्षित बरसात न होने से बागवानी, सब्जी, कृषि वानिकी एव पौधरोपण अभियान पर भी असर पड़ा है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. आरपी सिंह कहते हैं कि धान के कटोरे में अपेक्षित बरसात में लगातार हो रही गिरावट क्लाईमेट चेंज का उदाहरण है। इसका प्रभाव फसल चक्र पर भी पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि बरसात की कमी का प्रभाव जीव एवं वनस्पति जगत पर भी पड़ रहा है। उन्होंने जलवायु के अनुरूप फसलों की प्रजातियों की खेती करने की सलाह दी। पर्यावरण विद परशुराम सिंह ने कहा कि प्रकृति के अवयवों से छेड़छाड़ कर पर्यावरण को नजरंदाज कर विकास की तेज प्रक्रिया ने पर्यावरण को नुकसान पहुचाया है। इससे जलवायु परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने कहा कि वृक्षारोपण ही पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा उपाय है।
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