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मन में था मां भारती के लिए लड़ना है: योगेंद्र यादव

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मन में था मां भारती के लिए लड़ना है: योगेंद्र यादव
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गुलावठी। ग्राम औरंगाबाद अहीर निवासी परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव ने आत्मकथा में कारगिल युद्ध का जिक्र करते हुए लिखा है कि वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध में एक समय ऐसा था पाक घुसपैठियों के हमले में उनका शरीर लहूलुहान हो गया था। उनकी नाक से खून की धार बह रही थी, उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। जांघ सहित शरीर के अन्य हिस्सों में गोलियां लगी हुई थी, परंतु मन में था कि मां भारती के लिए आखिरी सांस तक उन्हें लड़ना है। इसी जज्बे से वह कारगिल में टाइगर हिल पर चढ़ते गए और 17 गोलियां खाते हुए टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा दिया।
योगेंद्र सिंह यादव ने कारगिल युद्ध के बारे में आत्मकथा में लिखा है कि 5 मई 1999 को उनकी शादी हुई थी, परंतु वह शादी के बाद ही अपनी नवविवाहिता पत्नी को घर पर छोड़कर कारगिल में युद्ध लड़ने आ गए। उन्हें टाइगर हिल पर कब्जा करने का टारगेट दिया गया। उनकी घातक प्लाटून दस्ता 16500 फिट ऊंची व बर्फीली चोटी टाइगर हिल पर रात में चढ़े। दुश्मन पर हमला करने के लिए उन्होंने रात में चढ़ाई शुरू की। पाक घुसपैठिए टाइगर हिल पर कब्जा किए थे। वह चट्टानों पर रस्सियों की सहायता से दुश्मनों के बंकरों तक पहुंचे। केवल 7 भारतीय जवान दुश्मनों के बंकरों तक पहुंच सके।
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5 रुपये के सिक्के ने बचाई जान
पाक घुसपैठियों ने उन्हें भी गोली मारी। उनकी जेब में 5 रुपये का सिक्का था। गोली सिक्के में लगी, जिसके कारण उनकी जान बच सकी। वह समय का इंतजार करते रहे और मौका देखकर उन्होंने दुश्मनों पर हमला किया।
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बचपन से लेकर अब तक के संघर्ष का जिक्र
योगेंद्र ने अपनी आत्मकथा में बचपन में सरकारी स्कूलों में पढ़ाई और खेतीबाड़ी आदि का भी जिक्र किया है। किसान के बेटे के रूप में वह सेना में भर्ती हुए। मात्र 19 साल की उम्र में कारगिल युद्ध में पाक घुसपैठियों से लोहा लिया। किताब में फौज की ट्रेनिंग के बारे में भी जानकारी दी गई है। उन्होंने कहा कि उनकी यह किताब देशवासियों को समर्पित है। योगेंद्र यादव सेना से आनरेरी लेफ्टीनेंट पद से रिटायर हो चुके हैं।
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