शिक्षा और सुधार की उनका मकसद था.. सियासत में कदम रखने से साथ ही पूर्व विधायक स्वामी नेमपाल सिंह ने शिक्षा के लिए जद्दोजहद शुरू कर दी। बात 1962 की है क्षेत्र के छात्र-छात्राओं को पढ़ाई के लिए शहर की दौड़ लगानी पड़ती थी। ऐसे में उन्होंने गांव ईलना परवाना में लोक किसान इंटर कॉलेज की स्थापना की ठान ली। इसके लिए उन्होंने अपनी 14 बीघा जमीन भी बेच दी।
शुरुआत में उन्होंने अपने आप से शपथ ली थी कि जब तक कॉलेज का निर्माण पूरा नहीं होगा तब तक वह साधारण वस्त्र(धोती-कुर्ता) ही धारण करेंगे। तब से लोगों ने नाम से पहले स्वामी लगाना शुरू कर दिया। वह जब भी चुनाव लड़े, क्षेत्र के लोगों की मांग पर लड़े।
जनता के हित की बात करते हुए उन्हें जेल तक जाना पड़ा, लेकिन राजनीति में आपराधिक छवि वाले लोगों के प्रवेश करते ही उन्होंने विरोधस्वरूप राजनीति छोड़ दी थी। 15 अप्रैल 1927 को सदर तहसील के गांव चांदपुर निवासी किसान छिद्दा सिंह के घर जन्मे स्वामी नेमपाल सिंह ग्रामीण विकास मंत्री रहे, लेकिन परिवार के लिए कुछ नहीं किया।
उन्होंने एनआरईसी कॉलेज से अंग्रेजी विषय से एमए की डिग्री हासिल की। छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के बाद वर्ष 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) से बुलंदशहर लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस की लहर के चलते कुंवर सुरेंद्र पाल सिंह से चुनाव हार गए।
इसके बाद वर्ष 1967 में स्याना विधानसभा से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़े और कद्दावर नेता मुमताज मोहम्मद खान को हराया। इसके बाद वर्ष 1971 में चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल से एक बार फिर बुलंदशहर लोकसभा से चुनाव लड़े। एक बार फिर कुंवर सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उन्हें करीब 1300 वोटों से हरा दिया।
वर्ष 1973 से 1977 तक कांग्रेस से जिला परिषद के चेयरमैन रहे। इसके बाद वर्ष 1980 में कांग्रेस के टिकट पर डिबाई विधानसभा से चुनाव लड़े और पिछले 20 साल से विधायक रहे बाबू हिम्मत सिंह को हरा दिया। वर्ष 1985 में डिबाई विधानसभा से पूर्व मंत्री हितेश कुमारी से मामूली अंतर से चुनाव हार गए।
वर्ष 1989 में एक बार फिर डिबाई की जनता ने स्वामी नेमपाल सिंह को पसंद किया। वर्ष 1991 में उन्होंने राजनीति छोड़ दी। स्वामी नेमपाल सिंह के पुत्र प्रभात ने बताया कि राजनीति में आपराधिक छवि वाले लोगों के प्रवेश के चलते उन्हें राजनीति छोड़ दी। 26 जनवरी 2011 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कर दिया।