मां की प्रेरणा से मिली हमें कामयाबी
बुलंदशहर। ‘इसलिए चल न सका कोई खंजर मुझ पर, मेरी शह-रग पर मेरी मां की दुआ रखी थी। नजीर बाकरी की यह लाइन मां के वात्सल्य के प्रति बिल्कुल सटीक बैठती हैं। कहते हैं कि मां तो मां होती है, फिर चाहे पेशे से वह एक चिकित्सक हो, पुलिसकर्मी हो या अन्य किसी भी सेवा में हो। मदर्स डे पर हम कुछ ऐसी ही माताओं के बारे में जानेंगे, जिन्होंने न सिर्फ अपने बच्चों को ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि महामारी के इस दौर में परिवार के साथ ही देश की भी सेवा कर रही हैं।
अस्पताल से आने के बाद भी मां-पापा रहते हैं दूर
यमुनापुरम निवासी करीब आठ वर्षीय शिवांश शर्मा लगभग पूरे दिन घर में अकेले रहते हैं, उनकी मां डॉ. ज्योति शर्मा एक डेंटल सर्जन और पिता डॉ. विशाल शर्मा एक फिजीशियन हैं। ऐसे में जब दोनों अस्पताल में होते हैं तो शिवांश को अपने अन्य परिजनों के साथ ही घर में रहना पड़ता है। जब डॉक्टर ज्योति ड्यूटी से वापस आती हैं तो शिवांश उनसे गले मिलने की कोशिश करता है, लेकिन वह ऐसा नहीं करने देती हैं। शिवांश के मुताबिक मम्मी-पापा दोनों अलग-अलग कमरे में रहते हैं और मुझे अलग कमरे में रहना पड़ता है। मम्मी-पापा कहते हैं कि कोरोना बीमारी के कारण ऐसा करना जरूरी है, ताकि हम कोरोना से बच सकें। डॉ. ज्योति ने बताया कि प्रतिदिन वह अस्पताल से घर जाकर अपने बच्चे से मिलना चाहती हैं, लेकिन दूर से ही बात करनी पड़ती हैं।
परिवार के साथ देश के प्रति भी फर्ज निभा रहीं मां
देहात कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर अरुणा राय की नौ वर्षीय बेटी सना और चार वर्षीय बेटी नंदिता बहुत छोटी हैं। इसके बाद भी अरुणा राय दोनों जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहीं हैं। बड़ी बेटी सना ने बताया कि उनके पिता पवन कुमार भी दिल्ली पुलिस में सीनियर अधिकारी हैं। कोरोना महामारी के समय में मां को ड्यूटी पर जाने से मना करती हूं, लेकिन मां कहती है कि अपनी जिम्मेदारी के साथ देश की जिम्मेदारी निभाना भी जरूरी है। मां जब ड्यूटी पर होती हैं तो फोन पर कई बार उनसे बात करती हूं। छोटी बहन नंदिता भी मां को मिस करती है। इंस्पेक्टर अरुणा राय ने बताया कि अपने परिवार की जिम्मेदारी तो सब निभाते हैं, लेकिन यह समय परिवार के साथ-साथ देश की जिम्मेदारी निभाने का भी है।
चिकित्सीय पेशे के साथ परिवार की जिम्मेदारी निभाई
मेरी मां डॉ. शोभा गर्ग एक स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। करीब 40 वर्षों से वह मरीजों की सेवा कर रहीं हैं। कोरोना महामारी के इस दौर में जब वह मरीजों के उपचार में व्यस्त रहती हैं तो घर में उनके लौटने का सभी को इंतजार रहता है। उम्र अधिक होने के बाद भी जिस भाव से वह मरीजों की सेवा कर रहीं हैं, वह सराहनीय है। मां ने अपने चिकित्सीय पेशे के साथ अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियां निभाई हैं। डॉ. शोभा गर्ग बताती हैं कि वैसे तो कोरोना संक्रमित मरीजों का उन्हें उपचार नहीं करना पड़ता, फिर भी हालात खराब होने के चलते हमेशा डर बना रहता है। घर में करीब 30 वर्षीय बेटा प्रशांत गर्ग, पुत्रवधू छवि गर्ग और दो छोटी बच्चियां हैं। इससे मन में और भय बना रहता है कि कहीं मेरे कारण इनके स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। फिर भी सावधानियां रखते हुए खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखने का हर संभव प्रयास कर रही हूं।
मां की प्रेरणा से बना अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी
मां एक छोटा सा शब्द है, लेकिन इस शब्द के पीछे जो शक्ति है वह दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है। मां चाहे अनपढ़ हो या पढ़ी लिखी हो, लेकिन जब बात उसके बच्चों की आती है तो वह हमेशा वह सीख देती है जो बच्चों के भविष्य को संवारे। यह कहना है गांव पचौता निवासी अंतरराष्ट्रीय बॉक्सर सतीश यादव का। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के फाइनल में जब मुझे शिकस्त मिली तो मैं काफी दुखी हो गया था। मैच खत्म होने के बाद जब गांव में अपनी मां गुड्डी देवी से बात की तो उन्होंने मेरी हारने की बात सुनी ही नहीं और मेरी कामयाबी की जमकर तारीफ की। बाद में जब मैच में हुए पक्षपात की बात कही तो उन्होंने ढांढस बंधाया और ठीक वैसे ही समझाया, जैसे वह बचपन में समझाया करती थीं। उन्होंने कहा कि यह छोटी स्टेज है, लक्ष्य तो ओलंपिक में गोल्ड जीतने का है। मैं आज जिस मुकाम पर हूं, वहां पहुंचना मां की प्रेरणा, डांट और प्यार के बिना असंभव था।
पिता के जाने के बाद मां की प्रेरणा से बनीं पुलिस अधिकारी
मैं जो भी हूं, जिस भी पद पर कार्यरत हूं, वह बिना मां चित्रलेखा श्रीवास्तव की सहायता के संभव नहीं था। जब मैं 11वीं कक्षा में थी तो मेरे पिता जी का देहांत हो गया था। इसके बाद मेरी मां ने ही मुझे पढ़ाया और इस काबिल बनाया कि मैं वर्ष 2009 में डिप्टी एसपी बन सकी। पिता जी की मौत के बाद मां ने ही मुझे ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के लिए प्रेरित किया। कोरोना महामारी के इस दौर में मैं क्षेत्र में रहकर लोगों की मदद कर रहीं हूं। मां ने मुझे संस्कार दिए हैं कि जीवन में जितना हो सके लोगों की मदद करनी चाहिए। साथ ही लोगों से भी अपील करती हूं कि महामारी की गंभीरता को समझें और कोविड गाइडलाइन का पालन अवश्य करें। जिससे स्थिति और गंभीर न हो। जल्द ही देश महामारी से मुक्त हो जाए।
मां और बड़ी मां के आशीर्वाद से हासिल किया मुकाम
मां महज एक शब्द नहीं होता, ये अपने आप में एक पूरी वर्णमाला है। एक बच्चे के लिए चाहे वो जीवन का पहला कदम हो या रास्ते में आने वाली मुश्किलें, अगर कोई है जो हमें सबसे पहले संभालने आता है तो वह मां ही होती है। फिल्म निर्देशक अक्षय कुमार ने बताया कि मैं इतना भाग्यशाली हूँ कि मुझे एक नहीं बल्कि दो मां का प्यार मिला है। मेरी मां कमला देवी के साथ बड़ी मां मुन्नी देवी ने हमेशा मुझे अपना बेटा समझा। जिसकी बदौलत आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इकलौता ऐसा फिल्म डायरेक्टर हूं, जिसकी फिल्म डिजनी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हुई है और मेरी शॉर्ट फिल्म को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी चयनित किया गया। अक्षय के मुताबिक मां के सपोर्ट के कारण ही मैं एमबीए करने के बाद थिएटर लाइन में आया क्योंकि इतनी पढ़ाई के बाद सभी घर वाले सोचते हैं कि उनका बेटा नौकरी कर रुपये कमाए, लेकिन मां ने मेरी भावनाओं को समझा और मुझे इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए दिन-रात एक कर दिए।