संघर्ष से जीती जंग, हासिल किया मुकाम
बुलंदशहर। एक ओर जीवन साथी से बिछड़ने का गम तो दूसरी ओर बच्चों की परवरिश और उनके भविष्य की चिंता। इन दो पाटों के बीच संघर्ष करती जिले की कुछ विधवा महिलाओं ने न सिर्फ खुद को संभाला बल्कि अपने बच्चों को भी अच्छी परवरिश देकर उच्च पदों तक पहुंचाया। विधवा दिवस पर हमने कुछ ऐसी ही महिलाओं से उनके संघर्ष और सफलताओं पर बातचीत की।
नहीं मिला सहारा, फिर भी बेटियों का भविष्य संवारा
शिकारपुर स्थित हैप्पी ब्लू बर्ड पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्य गार्गी शर्मा 30 जून 2006 को कभी नहीं भूल सकतीं। इसी दिन उनके पति अशोक शर्मा का निधन हो गया था। अशोक शिकारपुर में डेरी और स्पेलर चलाते थे। उनकी मौत के बाद ससुराल वालों ने गार्गी और उनकी तीन बेटियों को बेसहारा छोड़ दिया। अपनी तीनों बेटियों को लेकर गार्गी पहले अपने मायके डिबाई क्षेत्र के गांव इंदौर खेड़ा पहुंचीं। उसके बाद वह नरौरा में किराए का कमरा लेकर एक स्कूल में पढ़ाने लगीं। गार्गी अच्छी पढ़ी लिखी थीं, इसलिए उन्होंने जल्द ही परिवार को संभाल लिया। अपनी मेहनत और संघर्ष के बलबूते वह उसी स्कूल में प्रधानाचार्य बन गईं। बेटियों को भी उन्होंने अच्छी शिक्षा दी। उनकी बड़ी बेटी उमाक्षी भारद्वाज बीटेक करने के बाद एक आईटी कंपनी में इंजीनियर हैं। दूसरी बेटी वैष्णवी बीटेक कर प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रही हैं और तीसरी बेटी निस्तारणी भारद्वाज 12वीं की पढ़ाई कर रही हैं।
कठिन परिश्रम से दोनों बेटों को पहुंचा उच्च पद पर
जहांगीराबाद स्थित एक कान्वेंट स्कूल में प्रधानाचार्या सुधा चौहान ने 13 साल पहले अपने पति को खो दिया। उनके पति रमेश सिंह चौहान की जहांगीराबाद शुगर मिल में बीमारी के चलते ड्यूटी के दौरान मौत हो गई थी। उनके निधन के बाद सुधा को दो बेटों की परिवरिश की चिंता सताने लगी थी। 13 साल पहले उन्होंने कठिन परिश्रम से ही प्रधानाचार्या का पद हासिल किया और उसके बाद दोनों बेटों को उच्च शिक्षा दी। उनके संघर्ष और परिश्रम का असर यह रहा कि उनका बड़ा बेटा मोहन चौहान दिल्ली स्थित एक कंपनी में सीए है। दूसरा बेटा उन्मुक्त चौहान दिल्ली स्थित एक कोरियर कंपनी में बतौर मैनेजर तैनात है।
चाय बेचकर बच्चों को पढ़ा रहीं पूनम
नगर के राधानगर में रहने वाली पूनम शर्मा के पति कुलदीप शर्मा का 2010 में निधन हो गया। उनके निधन के बाद परिवार में कोई ऐसा नहीं रहा जो सहारा दे सके। पूनम भी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थीं। ऐसे में उन्होंने चाय की दुकान चलाने का निर्णय लिया और बच्चों की पढ़ाई जारी रखी। बड़ी बेटी यशी भारद्वाज का दाखिला विद्या ज्ञान स्कूल में हो गया। यह दिन उनके लिए सबसे ज्यादा खुशी वाला था। पूनम की अच्छी परवरिश की बदौलत यशी ने हाईस्कूल 2016 की बोर्ड परीक्षा में जनपद में टॉपटेन में जगह बनाई। वर्ष 2018 में 12वीं की बोर्ड परीक्षा में भी यशी ने जनपद की टॉपटेन सूची में अपना नाम कायम रखा। अब यशी बीकॉम अंतिम वर्ष की छात्रा है। पूनम उसे उच्च पद पर आसीन देखना चाहती हैं। उनका बेटा निशांत इस समय इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है।
खुद भी पढ़ीं, बेटियों को भी पढ़ाया
छतारी में रहने वाली अनीता शर्मा की कहानी कुछ अलग है। 1991 में पति सुभाष चंद शर्मा की मौत के बाद दो बेटियों और एक बेटे की परवरिश की चिंता सताने लगी। वह आठवीं तक ही पढ़ी थीं। उन्होंने आगे पढ़ने का निर्णय लिया। बच्चों के साथ उन्होंने पहले एमए किया और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बनीं। बड़ी बेटी पूजा को एमए अंग्रेजी और छोटी बेटी चारूल को एमएससी मैथ तक की पढ़ाई कराई। बेटे आलोक को बीएससी करवाया। आलोक ने नौकरी के लिए काफी प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिलने पर अब अब उसका बिजनेस शुरू करवा दिया है। अनीता शर्मा कहती हैं, ‘थोड़ी सोच और कठिन परिश्रम से खुद और बच्चों के जीवन को संवारा जा सकता है।’