बुलंदशहर। विशेषज्ञ और संसाधनों की कमी से जूझ रहे सरकारी चिकित्सालय आयुष्मान लाभार्थी को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। विशेषज्ञ व संसाधन न होने पर आयुष्मान योजना के तहत निशुल्क इलाज के लिए लाभार्थी निजी अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। अब तक 90028 लाभार्थी इलाज करवा चुके हैं। इसमें मात्र .47 प्रतिशत लोगों ने ही सरकारी चिकित्सालयों में योजना के तहत इलाज करवाया। शेष ने निजी अस्पतालों में इलाज करवाया।
आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना सितंबर 2018 में शुरू हुई थी। इस योजना में 2011 की जनगणना के अनुसार गरीब परिवारों को आयुष्मान योजना का पात्र माना गया। जिले में 2,29,504 परिवार को इस योजना से जोड़ा गया। योजना के तहत प्रत्येक पात्र परिवार के सदस्यों को वर्ष में पांच लाख रुपये तक का निशुल्क इलाज कराने की छूट दी गई। योजना को सरकारी के साथ निजी अस्पतालों से जोड़ा गया। इससे गरीब लोगों को महंगा इलाज निजी अस्पतालों में कराने की छूट मिलने पर काफी लोगों ने लाभ लिया। लेकिन लोग इलाज की जरूरत पड़ने पर सरकारी की जगह निजी अस्पताल में उपचार कराना पसंद कर रहे हैं।
योजना से जुड़े है जिले के 18 सरकारी समेत 82 अस्पताल
योजना के नोडल अधिकारी डॉ. गौरव सक्सेना ने बताया कि जिले में आयुष्मान योजना से जिला अस्पताल, जिला महिला अस्पताल, जटिया चिकित्सालय, महिला अस्पताल खुर्जा, संयुक्त चिकित्सालय और 13 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जुड़े हुए हैं। साथ ही 64 निजी अस्पताल भी योजना से जुड़े हैं। जल्द ही कुछ निजी अस्पताल और 61 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी योजना से जोड़े जाएंगे। इसको लेकर कार्य चल रहा है।
अब तक 76 करोड़ रुपये का करवा चुके हैं इलाज
विभागीय अफसरों के अनुसार जिले में 8,05,288 लाभार्थियों के गोल्डन कार्ड जारी किए जा चुके हैं। इसमें अभी तक 90,028 पात्र ने योजना के तहत निशुल्क इलाज कराया है। इसमें 421 ने सरकारी तो 89,607 ने निजी अस्पतालों में इलाज करवाया। योजना के नोडल अधिकारी डॉ. गौरव सक्सेना ने बताया कि 78,304 मरीजों का इलाज पूर्ण होने पर चिकित्सालयों की ओर से क्लेम मांगा गया। अब तक 76 करोड़ 58 लाख रुपये का भुगतान अस्पतालों को किया जा चुका है।
सरकारी में सिर्फ करवाते है डिलीवरी
सरकारी चिकित्सालयों में संसाधन व सुविधाएं होने के बावजूद उन्हें समय पर लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए लाभार्थी निजी अस्पताल की ओर दौड़ लगाता है। तीन माह पूर्व एक लाभार्थी ने पैर का ऑपरेशन करवाने के लिए जिला अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ से संपर्क किया तो संबंधित ने इलाज के नाम पर रुपये की डिमांड की। जबकि अस्पताल में निशुल्क इलाज होता है। वहीं, गोल्डन कार्ड धारक बताए जाने पर संबंधित ने इलाज करने से मना कर दिया। इसके बाद उसे निजी अस्पताल जाना पड़ा। यहीं स्थिति अन्य मरीजों के साथ भी रही। इस कारण भी सरकारी चिकित्सालय में लोग योजना के तहत इलाज नहीं करवा रहे। वहीं, निजी अस्पतालों में प्रसव की सुविधा एक साल पूर्व बंद किए जाने पर अब सिर्फ सरकारी चिकित्सालय में ही योजना के तहत प्रसव की सुविधा दी जाती है। प्रसव के मामले हटा दिए जाए तो अन्य मरीजों की संख्या 50 से अधिक नहीं है। जबकि सरकारी में हार्निया, पथरी, गांठ, गाल ब्लैडर, हड्डी व नेत्र के रोगियों के आपरेशन करने की भी सुविधा है।
जिले में अब तक 805288 पात्र के गोल्डन कार्ड बन चुके है। इसमें 90028 ने योजना के तहत निशुल्क इलाज का लाभ लिया है। इसमें 421 ने सरकारी चिकित्सालयों में इलाज करवाया है। सरकारी चिकित्सालयों में पात्र के इलाज करने के निर्देश दिए गए हैं। - डॉ. विनय कुमार सिंह, सीएमओ