याद आया इतिहास
भारतीय चुनाव इतिहास पर गौर करें तो 1977 में आपातकालीन और कांग्रेस विरोधी लहर में जनता पार्टी के महमूद हसन सांसद बने। 1980 में जाट मुस्लिम एका की जातिवादी लहर ने महमूद हसन को फिर जिताकर दिल्ली भेज दिया। 1983 में पूर्व सीएम बनारसी दास सांप्रदायिक लहर से संसद पहुंचे। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर में सुरेंद्र पाल सिंह ने जीत दर्ज की। 1989 में बोफोर्स तोप सौदा घोटाले के कारण भ्रष्टाचार विरोधी लहर में जनता दल के सरवर हुसैन ने कांग्रेस को पटखनी दे दी।
लहर का असर 1991 में भी रहा। राम लहर ने मुद्दों को पीछे धकेल दिया और भाजपा के डाक्टर छत्रपाल सिंह ने विजय पताका फहरा दी। 1996 और 1998 में भी राम लहर से भाजपा का कमल यहां खिला। 1999 में राम लहर कमजोर पड़ी लेकिन जाति की लहर ने फिर भाजपा को संसद तक पहुंचाया। 2004 में कल्याण सिंह और 2009 में कमलेश वाल्मीकि जाति की लहर पर सवार होकर संसद तक पहुंचे। इस बार नरेंद्र मोदी की लहर और कांग्रेस के खिलाफ बने माहौल ने कमल खिला दिया। इसी के बल पर भोला सिंह सांसद बन गए।
यह था प्रत्याशियों की जीत का गणित
डाक्टर भोला सिंह, भाजपा
यूपीए सरकार की नाकामी, भाजपा के विकास के दावे, पार्टी के परंपरागत वोट, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, कल्याण सिंह का आशीर्वाद।
कमलेश वाल्मीकि, सपा
कमलेश वाल्मीकि को सांसद होने के नाते जनता का प्यार मिलने के साथ वाल्मीकि, ब्राह्मण, मुस्लिम, पिछड़े वर्ग के वोटरों के साथ सरकार की तरफ की गई मेहरबानियों के चलते कर्मचारियों, किसानों, छात्र-छात्राओं के बल पर नैया पार लगाने की थी आस।
प्रदीप जाटव, बसपा
प्रदीप जाटव को चुनाव के एक साल पहले से लगातार जनता के संपर्क में रहने और बसपा के वोट बैंक (दलित) के साथ मुस्लिम, पिछड़े वर्ग के अलावा केंद्र और प्रदेश सरकारों की नाकामी को उजागर कर लोगों को साथ जोड़ने की कोशिश की थी।
रालोद-कांग्रेस गठबंधन
रालोद का अकेली महिला प्रत्याशी उतारने का दांव, प्रत्याशी के खुद का दलित होना, मुस्लिम युवक से शादी करना, अजित के नाम पर पार्टी के वोट बैंक जाट के साथ के दम पर फतह करने की कोशिश थी।