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‘कितना शर्मिंदा करेगी आज फिर बच्चों की भूख...’

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‘कितना शर्मिंदा करेगी आज फिर बच्चों की भूख...’
- बज्मे़ खुलूस-ओ अदब की स्वर्ण जयंती पर सजी शायरों की महफिल
अमर उजाला ब्यूरो
बुलंदशहर।
‘कितना शर्मिंदा करेगी आज बच्चों की भूख, अश्क लेकर आज भी लौटा हूं मैं बाजार से...।’ शायर शम्स रम्जी ने जब यह गजल पेश की तो महफिल तालियों से गूंज उठी। मौका था नगर के एक होटल में बज्मे खुलूस-ओ अदब की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित ऑल इंडिया मुशायरे का। इसमें देश भर के मशहूर शायरों ने भागीदारी कर एक के समां बांध दिया।
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सलीम ताजिश लखनऊ ने ‘मुसलसल चलते रहना जिंदा रहने की अलामत है, यही पैगाम देता है हमें बहता हुआ पानी’ पेश किया। झारखंड से आए तनहा बेकराबी ने ‘अगर दारोरसन की आजमाइश की कटौती पर खरे उतरे नहीं होते तो हक फैला नहीं होता।’ ऐन मीम कौसर ने ‘हर बात निकली है जुबां से तेरी कड़ी, दांतों में तेरे नीम का पता तो नहीं है।’ आदिल रशीद दिल्ली ने ‘नहीं तुमको जरूरत फिर भी आदिल तैरना सीखो, बहुत पछताओगे जिस दिन कोई भी डूबता होगा।’ युसूफ सहराई ने ‘हमारे सर पै अभी सायबान बाकी है, यकीन हो न हो लेकिन गुमान बाकी है।‘ असर ललितपुरी ने ‘अपनी ही किसी बात पै हमल रूठ गए थे, अब हाल है ये खुद को मनाने में लगे हैं’ जैसी गजलें पेश कर खूब तालियां बटोरीं। वारिस वारसी, दानिश गजल मेरठी, उज्मा परवीन, नईम अख्तर, देवबंदी, हसरत सरावनी दर्द देहल्वी, शहला नवाब, सलीम स्यानवी, अयाज हापुड़ी, जमशेद माहिर, अनामुल्लाह खालिद आदि ने भी मुशायरा पेश किया। मुशायरे के मुख्यातिथि पूर्व विधायक हाजी अलीम और अध्यक्षता सम्स रम्जी ने की। कार्यक्रम की शुरूआत वारिस वारसी ने नाते पाक से की। संचालन सैय्यद अली अब्बास ने किया।
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