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भाजपा की जीत हुई या हार, खेमे की खामोशी बरकरार

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भाजपा की जीत हुई या हार, खेमे की खामोशी बरकरार
बुलंदशहर। छह माह से जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर चल रही उठापटक सोमवार को शांत हो गई। अध्यक्ष प्रदीप चौधरी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया और विपक्ष की जीत हुई। लेकिन, एक सवाल अब भी बरकरार है कि आखिर यह भाजपा की जीत है या हार! पार्टी खामोश है और सोमवार को न प्रदीप चौधरी पहुंचे और न ही भाजपा पदाधिकारी कलक्ट्रेट परिसर में नजर आए। सूत्रों की मानें तो इस बार भाजपा का एक बड़ा धड़ा सांकेतिक रुप से विपक्ष के साथ था।
बीते अगस्त-सितंबर माह में जिला पंचायत सदस्यों के एक गुट ने जिपं अध्यक्ष प्रदीप चौधरी के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था। बागी सदस्यों में भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस के सदस्य शामिल थे। इस गुट की बागडोर भाजपा के महेंद्र भैया के हाथ में थी। विपक्ष की ओर से अब तक वही जिपं अध्यक्ष की कुर्सी के प्रबल दावेदार भी हैं। दूसरी ओर तत्कालीन अध्यक्ष प्रदीप चौधरी को भी भाजपा का समर्थन हासिल था। भाजपा की धार में ही उन्हें कुर्सी हासिल हुई थी। लेकिन, अध्यक्ष और सदस्यों के बीच तालमेल नहीं बैठ सका। विपक्ष की ओर से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और अब वह प्रस्ताव पारित भी हो गया। 44 जिपं सदस्य प्रदीप चौधरी के खिलाफ आवाज बुलंद किए नजर आए। सोमवार को अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा में न तो खुद अध्यक्ष प्रदीप चौधरी शामिल हुए और न ही उनके पक्ष के सदस्य शामिल हुए। सदन की कार्रवाई पूरी तरह एक तरफा रही। दूसरी ओर सूत्रों की मानें तो इस बार हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारियों ने इस मामले से खुद को दूर रखना ही मुनासिब समझा था। हालांकि, इस बाबत पदाधिकारी कुछ भी खुलकर बोलने का तैयार नहीं हैं। मतदान पूरा होने के बाद जब एक पूर्व पदाधिकारी से चर्चा की गई तो उन्होंने भी कुछ बोलने से इंकार कर दिया। वहीं, जिला अध्यक्ष हिमांशु मित्तल ने कहा कि पार्टी संगठन फिलहाल लोकसभा चुनावों की तैयारी व्यस्त है।
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...तो भाजपा ने छोड़ा साथ!
जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ सोमवार को अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ। अविश्वास पर चर्चा और मतदान की तिथि बीते 29 जनवरी को ही तत्कालीन डीएम ने तय कर दी थी। इसके बावजूद सोमवार को भाजपा का कोई पदाधिकारी अपने अध्यक्ष के समर्थन में मतदान का हाल जानने के लिए मौजूद नजर नहीं आया। वहीं, सितंबर माह में अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस के दौरान जिलाध्यक्ष पूरे दल-बल के साथ मौजूद थे। चर्चा है कि जिपं अध्यक्ष के खिलाफ पारित हुए अविश्वास प्रस्ताव में विपक्ष को अप्रत्यक्ष व सांकेतिक रूप से भाजपा के एक बड़े तबके का समर्थन हासिल था। यही वजह रही कि बीते सात सितंबर की अपेक्षा इस बार अधिक सदस्य विपक्ष के साथ पहुंचे थे।
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