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बदायूं की जामा मस्जिद के मुकदमे में साक्ष्य बनेंगे इतिहास के पन्ने

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बदायूं। शहर के सोथा मोहल्ले स्थित जामा मस्जिद का मामला अब वाराणसी की ज्ञानवापी और मथुरा की ईदगाह मस्जिद की तरह सुर्खियों में आ गया है। सिविल जज सीनियर डिवीजन विजय कुमार गुप्ता की अदालत में दायर किए गए मामले में हिंदू महासभा ने जामा मस्जिद शमशी (जामा मस्जिद) को नीलकंठ महादेव का मंदिर होने का दावा किया है। अब इंतजामिया कमेटी अपना पक्ष रखेगी।
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हिंदू महासभा ने बदायूं जिले का गजेटियर, इंतखाब, नक्शा, सूचना विभाग द्वारा जारी पुस्तक विकास सूचना प्रदर्शनी और सूचना संप्रेषण पुस्तिका से मिले साक्ष्य को आधार बनाया है। अधिवक्ता वेदप्रकाश साहू के मुताबिक 905 ईस्वी में राजा लखनपाल ने नीलकंठ मंदिर का निर्माण कराया था। 1175 ईस्वी में राजा अजयपाल ने इसका जीर्णोद्घार कराया था। 1780 ईस्वी में यह स्थान राजा कुंदनलाल के कब्जे में था। 1855-56 में अंग्रेजी शासन काल के दौरान अंग्रेज जिलाधिकारी लैम्ब ने इसके पूर्वी गेट का निर्माण कराया था। इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक का दामाद था। उसने राजा महीपाल की हत्या कर दी और उनके किले पर कब्जा कर लिया। उसी दौरान नीलकंठ महादेव का मंदिर तहस नहस कर दिया गया। उसने किले को जामा मस्जिद शमशी नाम दिया था। इंतजामियां कमेटी जामा मस्जिद ने अभी कोई सबूत पेश नहीं किया है। कमेटी ने 15 सितंबर को अपना पक्ष रखने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। इंतजामियां कमेटी के अधिवक्ता असरार अहमद सिद्दीकी के अनुसार आदेश सात नियम 11 सीपीसी के अंतर्गत यह मुकदमा चलाने योग्य नहीं है। जामा मस्जिद का निर्माण करीब 12 सौ ईस्वी में हुआ था।
- हमने इस मुकदमे में केवल इंतजामियां कमेटी जामा मस्जिद को ही पक्षकार नहीं बनाया है। हमारी असली लड़ाई सरकार से है। यह राजा महीपाल का किला था। इतिहास में उसके साक्ष्य भी मौजूद हैं और हमने न्यायालय में तमाम साक्ष्य पेश भी किए हैं। सरकारी अभिलेखों में इसके साक्ष्य हैं। यह वक्फ बोर्ड की जगह भी नहीं है। राजस्व विभाग में केवल आबादी के नाम से दर्ज है। - वेदप्रकाश साहू, अधिवक्ता हिंदू महासभा
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- इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए 15 सितंबर तारीख तय की गई है। इस पर हम अपना पक्ष रखेंगे। यह मामला सुनने योग्य है ही नहीं। यह वर्षों से यह जामा मस्जिद है। इसमें नमाज पढ़ी जा रही है। पहले हम अपना पक्ष रखें। बाद में इसमें सबूत भी पेश करेंगे। - असरार अहमद सिद्दीकी, अधिवक्ता इंतजामियां कमेटी जामा मस्जिद
- यह वक्फ बोर्ड का मामला है। इसकी सुनवाई वक्फ बोर्ड के न्यायालय में होनी चाहिए। क्योंकि यह न्यायालय बदायूं में नहीं है। यहां दीवानी में मुकदमा चलाने का कोई औचित्य ही नहीं है। सन 1991 में एक एक्ट बना था, उसमें यह कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 से धर्मस्थलों में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा। अगर मंदिर है तो वह मंदिर रहेगा और मस्जिद है तो वह मस्जिद ही रहेगी। इसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। - अनवर आलम, अधिवक्ता इंतजामियां कमेटी जामा मस्जिद
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