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मेडिकल कॉलेज में दस सर्जन, सर्जरी दिन में आठ से भी कम

सार

जिले में राजकीय मेडिकल कॉलेज होने के बाद भी सर्जरी के लिए मरीजों को निजी डॉक्टरों के पास जाना पड़ रहा है।जिला अस्पताल में माइनर सर्जरी तो होती हैं, लेकिन मेजर सर्जरी के लिए मरीजों को मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है।ऐसे में उन्होंने करीब दस साल से कोई मेजर सर्जरी की ही नहीं है।
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बदायूं का राजकीय मेडिकल कॉलेज। संवाद - फोटो : BADAUN
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विस्तार
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बदायूं। जिले में राजकीय मेडिकल कॉलेज होने के बाद भी सर्जरी के लिए मरीजों को निजी डॉक्टरों के पास जाना पड़ रहा है। जिले में सीएचसी से लेकर जिला अस्पताल तक मेजर सर्जरी की व्यवस्था नहीं है। जिला अस्पताल में माइनर सर्जरी तो होती हैं, लेकिन मेजर सर्जरी के लिए मरीजों को मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है। मेडिकल कॉलेज में एक न्यूरो सर्जन समेत दस सर्जन हैं, फिर भी रोजाना सात-आठ सर्जरी ही हो पार रही हैं।
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सर्जरी संबंधी ज्यादातर मामलों को रेफर किया जा रहा है। करीब छह माह में एक भी न्यूरो सर्जरी नहीं हुई है। जिला अस्पताल की बात करें, तो यहां सर्जन के रूप में डॉ. प्रदीप अग्रवाल की तैनाती है। सेवाकाल के दौरान ज्यादातर उनकी तैनाती सीएचसी और पीएचसी पर रही। ऐसे में उन्होंने करीब दस साल से कोई मेजर सर्जरी की ही नहीं है। हालांकि, वह माइनर सर्जरी करते हैं।
राजकीय मेडिकल कॉलेज में सीएमएस डॉ. सीपी सिंह, डॉ. सारिका, डॉ. विपिन कुमार, डॉ. केके चौधरी, डॉ. निकुंज, डॉ. रजत, डॉ. धर्मेंद्र कुंतल, डॉ. आदित्य, डॉ. धर्मेंद्र कुमार सर्जन हैं। इसके अलावा न्यूरो सर्जन के रूप में डॉ. यशवीर सिंह की तैनाती है। दस सर्जन होने के बाद भी राजकीय मेडिकल कॉलेज में रोजाना सात-आठ सर्जरी ही हो रही हैं। इनमें मेजर और माइनर दोनों तरह की सर्जरी शामिल हैं।
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जिला अस्पताल से मेजर सर्जरी के लिए जब किसी मरीज को राजकीय मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है, तो वहां सर्जरी के लिए उसको कई-कई दिन इंतजार करना होता है। नौ सर्जन और एक न्यूरो सर्जन होने के बाद भी कई बार तो मरीज को यहां से सैफई, आगरा और अलीगढ़ रेफर कर दिया जाता है। सर्जरी के लिए कई-कई दिन लाइन में रहने के कारण मजबूरन काफी संख्या में मरीज निजी डॉक्टरों के यहां सर्जरी कराने को मजबूर होते हैं।
गौर करने की बात यह है कि करीब छह महीने से मेडिकल कॉलेज में एक भी न्यूरो सर्जरी नहीं हुई है। दौरी नरोत्तमपुर निवासी शीला मिश्रा का कहना है कि उनके पेट की सर्जरी होनी थी, लेकिन मेडिकल कॉलेज से उन्हें सैफई रैफर कर दिया गया। यही कहना था आमगांव के रामपाल और सखानू के अवधेश का। उनके मरीजों की सर्जरी को भी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए।
दो तरह की होती हैं सर्जरी, माइनर से चला रहे काम
जिला अस्पताल के सर्जन डॉ. प्रदीप अग्रवाल का कहना है कि सर्जरी एक मेजर और एक माइनर होती है। माइनर सर्जरी में फोड़ा, फुंसी, गांठ आदि शामिल होते हैं, लेकिन मेजर सर्जरी में शरीर के अंदरूरी हिस्से आते हैं। आर्थोपेडिक सर्जरी अलग होती है। उसके लिए आर्थोपेडिक सर्जन की जरूरत होती है। जिला अस्पताल में रोज 10 से 12 माइनर सर्जरी होती हैं। आठ से नौ आर्थोपेडिक सर्जरी होती हैं। जबकि यहां एक ही सर्जन और एक आर्थोपेडिक सर्जन हैं।
राजकीय मेडिकल कॉलेज में एक ही ऑपरेशन थिएटर है। एक ऑपरेशन थिएटर में एक बार में एक डॉक्टर ही सर्जरी कर सकता है। एक दिन में छह-सात सर्जरी भी बढ़ी बात है। दस सर्जन जरूर हैं, लेकिन सभी दिन सभी की ड्यूटी नहीं रहती। सर्जरी संबंधी जो भी मरीज आते हैं, उनमें गंभीरता वाले मामलों को प्राथमिकता दी जाती है। -डॉ. सीपी सिंह, सीएमएस राजकीय मेडिकल कॉलेज
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