बदायूं। थ्रेसिंग से अस्थमा (दमा) रोगियों की सांसें फूलने लगी हैं। मौसम में परिवर्तन और भूसे की धूल से वातावरण दूषित होने लगा है। तेज धूप में काम करने के कारण जहां डायरिया फैल रहा है, वहीं हवा में धूल के कारण दमा रोगियों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। जिला अस्पताल में प्रतिदिन 50 से 60 मरीज उपचार के लिए पहुंच रहे हैं।
वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. राजेश वर्मा बताते हैं कि अस्थमा सांस से जुड़ी बीमारी है, इसमें मरीज को सांस लेने में काफी तकलीफ होती है। इस बीमारी से सांस की नली में सूजन या पतलापन आ जाता है। इससे फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव महसूस होता है। ऐसे में सांस लेने पर दम फूलने लगता है, खांसी होने लगती है और सीने में जकड़न के साथ साथ खड़खड़ाहट की आवाज होती है। चिकित्सकों के अनुसार, तेज धूप में काम करने और थ्रेसिंग आदि के समय इसके बढ़ने की अधिक आशंका रहती है। यह बीमारी एक बार किसी को हो जाए तो जिंदगी भर रहती है।
टीकाकरण ही सुरक्षित रहने का आसान तरीका
फिजीशियन डॉ. नितिन सिंह का कहना है कि हर साल दमा के मरीज निमोनिया का टीका अवश्य लगवाए। लक्षणों के आधार पर अस्थमा दो तरह का होता है। इनमें बाहरी और आंतरिक शामिल हैं। बाहरी अस्थमा परागकणों, पशुओं, धूल, गंदगी, कॉकरोच आदि के कारण हो सकता है। आंतरिक अस्थमा कुछ केमिकल्स शरीर के अंदर जाने से होता है। वायु प्रदूषण, सिगरेट का धुआं, थ्रेसिंग भी कारण है। थ्रेसिंग क्षेत्र से मरीज दूर रहें। चिकित्सक से परामर्श लेकर दवाइयां तुरंत शुरू करें।
अस्थमा के लक्षण
-सांस फूलना, लगातार खांसी आना, छाती में कफ जमा होना, सांस लेने में दिक्कत होना आदि।
बचाव के उपाय
-थ्रेसिंग क्षेत्र से दूरी बनाकर रखें, डॉक्टर से संपर्क करें, धूप में काम करने से बचें, निमोनिया का टीका लगवाएं
दवा तो हर रोज खा रहे है, लेकिन सांस की परेशानी का स्थायी इलाज नहीं मिल पा रहा है। दमा बहुत खतरनाक है। रात-दिन चैन नहीं मिलता है। तेजपाल, दातागंज
वार्ड में भर्ती सांस के रोगी मरीज। संवाद- फोटो : Samvad
वार्ड में भर्ती सांस के रोगी मरीज। संवाद- फोटो : Samvad
वार्ड में भर्ती सांस के रोगी मरीज। संवाद- फोटो : Samvad
वार्ड में भर्ती सांस के रोगी मरीज। संवाद- फोटो : Samvad