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Budaun News: नई सियासी जमीन तलाशने के लिए किया है सेक्युलर फ्रंट का आगाज

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बदायूं। भले ही साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सलीम इकबाल शेरवानी और आबिद रजा की राहें अलग थीं लेकिन सियासी घटनाक्रमों ने दोनों को करीब लाकर खड़ा कर दिया। अब इन नेताओं के गठजोड़ ने नई सियासी जमीन तलाशने के लिए सेक्युलर फ्रंट का आगाज किया गया है।
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2022 में सलीम शेरवानी ने सपा के उम्मीदवारों का समर्थन किया था। आबिद रजा खां ने सपा के प्रत्याशियों के विरोध में जीतने का दम रखने वाले अपनी पसंद के उम्मीदवारों का समर्थन किया था। तब सलीम इकबाल शेरवानी को उम्मीद थी कि उन्हें सपा मुखिया अखिलेश यादव सपा को समर्थन देने के बदले सम्मान के साथ राज्यसभा में भेजेंगे। जब सपा ने पीडीए (पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक ) के फार्मूले का एलान किया तब भी सलीम शेरवानी को लगा था कि उन्हें उच्च सदन में सपा की ओर से भेजा जाएगा लेकिन जब सपा के उम्मीदवार तय हुए तो उनका नाम गायब था। इसी बाद से तल्खी बढ़ गई। इधर, धर्मेद्र यादव 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में थे और वह प्रयास करके आबिद रजा को करीब ले आए। साल 2023 में आबिद रजा खां की सपा में फिर वापसी हुई। वह राष्ट्रीय सचिव बने। साथ आंवला लोकसभा क्षेत्र से टिकट के दावेदार थे लेकिन आंवला में सपा ने नीरज मौर्य को उम्मीदवार बना दिया जिससे आबिद रजा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हुई। उन्होंने राष्ट्रीय सचिव पद छोड़ दिया। पद छोड़ने के बाद सलीम इकबाल शेरवानी और आबिद रजा खां ने मिलकर अपनी सियासी जमीन तलाशने के लिए नए सेक्युलर फ्रंट का आगाज किया। सपा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव ठाकुर योगेंद्र सिंह तोमर भी इस फ्रंट के कद्दावर नेता हैं।


चार दशक के सियासी सफर, 2019 में धमेंद्र यादव की हार की वजह बने थे सलीम इकबाल
बदायूं। चार दशक के सियासी सफर में सलीम इकबाल शेरवानी कांग्रेस और सपा में ही रहे। वह 2019 के चुनाव में सपा के तत्कालीन सांसद धर्मेंद्र यादव की हार की वजह भी बने थे। इसलिए बुधवार को सेक्युलर फ्रंट के आयोजन पर सपाई दिग्गजों की निगाहें लगी रहीं। आखिर क्या कदम उठाते हैं। यही सवाल सियासी गलियों में रहा। दूसरे दलों के स्थानीय नेता भी जानकारी लेते रहे।
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सपा ने बदायूं सीट 2009 में तत्कालीन सांसद सलीम शेरवानी का टिकट काट कर धर्मेंद्र यादव को उम्मीदवार बनाया था। उससे शेरवानी नाराज हुए और कांग्रेस से चुनाव लड़े। चार दशक के सियासी सफर में सलीम शेरवानी पहली बार 1984 मे कांग्रेस के टिकट पर बदायूं से सांसद बने थे। राजीव गांधी के करीबी रहे। कहा तो यह भी जाता वही उन्हें सियासत में लेकर आए थे। शेरवानी 1984 से पहले कोई चुनाव नहीं लड़े। सलीम पांच बार बदायूं से सांसद रहे और एक बार कांग्रेस तथा चार बार सपा से सांसद रहे है। 1996 में सपा के टिकट जब शेरवानी दूसरी बार सांसद बने तब संयुक्त मोर्चे की आईके गुजराल सरकार में विदेश राज्यमंत्री बनाए गए थे। 1998 में सपा के टिकट पर तीसरी बार सांसद चुने गए थे। चौथी बार सपा के ही टिकट पर 1999 में सांसद निर्वाचित थे। पांचवी बार सपा के ही टिकट पर 2004 मे सांसद बने। उसके बाद जब 2009 में टिकट कटा तो कांग्रेस से ही बदायूं से लड़े और तीसरे नंबर पर रहे। 2014 में आंवला लोकसभा से कांग्रेस से लड़े। 2019 में कांग्रेस के टिकट पर बदायूं से लडे़। तब 51947 मत पाए थे। इनकी उम्मीदवारी धर्मेंद्र यादव की पराजय का कारण बनी। धर्मेद्र यादव 20,000 मतों से हार गए थे। तब भाजपा की संघ मित्रा मौर्य सांसद चुनी गईं थीं।
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