हर साल आते थे अपने पैतृक घर
राशिद खान के सबसे छोटे मामा के बेटे नदीम ने बताया कि राशिद खान कोलकाता में बस जरूर गए थे लेकिन अपनी जन्मस्थली को कभी नहीं भूले। लगभग हर साल वह अपने कबूलपुरा स्थित घर पर आते थे और लोगों से मुलाकात करते थे। कोरोना के बाद उनका आना कम जरूर हुआ लेकिन वह हमेशा अपनों के संपर्क में रहे।
उन्हें बदायूं से इतना प्यार था कि हमेशा कहते थे कि अगर उन्हें कुछ हो जाए तो वहीं ले जाना जहां उनके वालिदैन को दफन किया गया। बृहस्पतिवार सुबह करीब साढ़े पांच बजे जब उनका शव कोलकाता से बदायूं पहुंचा तो आवास पर उनका आखिरी दीदार करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी।
पं. भीमसेन जोशी ने भी की थी तारीफ
राशिद खान की गायकी हमेशा अलग अंदाज में ही रही। अपने गुरु की तरह वह भी गायन में माहिर थे लेकिन गाने का अंदाज उनका अपना था। वह कहते भी थे कि गायकी में उन्हें कोई बंदिश पसंद नहीं है। उनके सुरों का जादू ही था कि उनकी तारीफ पं. भीमसेन जोशी ने भी खास अंदाज में की थी। उन्होंने राशिद खान को भारतीय संगीत का भविष्य बताया था।
संघ व भाजपा समेत कई ने दी श्रद्धांजलि
उस्ताद राशिद खान को सुपुर्द-ए-खाक किए जाने की सूचना पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघ चालक सुनील गुप्ता, विभाग प्रचारक विशाल, विभाग संपर्क प्रमुख मनीष सिंघल, भाजपा जिलाध्यक्ष राजीव कुमार गुप्ता ने भी कबूलपुरा स्थित उनके आवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की। जिलाध्यक्ष ने कहा कि उस्ताद राशिद खान का निधन शास्त्रीय संगीत की दुनिया में बहुत बड़ी क्षति है। संगीत के क्षेत्र में उनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता। उस्ताद तालिब हुसैन म्यूजिक एकेडमी के सदस्य आमिर सुल्तानी ने कहा कि राशिद खान का इंतकाल संगीत का नुकसान है, जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा।
रामपुर-सहसवान घराने के फनकारों ने जताया शोक
मशहूर शास्त्रीय गायक गुलाम मुस्तफा खान के बेटे रब्बानी मुस्तफा खां आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह मरहूम राशिद खान के ममेरे भाई हैं। बॉलीवुड गायक सोनू निगम, शान, हरिहरन समेत कई गायकों के गुरु रह चुके स्व. गुलाम मुस्तफा खान के बेटे रब्बानी भी राशिद खान के सुपुर्द-ए-खाक में मुम्बई से बदायूं पहुंचे। भाई के इंतकाल पर भी वह काफी गमजदा दिखे। कहा कि जब 2021 में वालिद का इंतकाल हुआ था तो बड़ा झटका लगा था लेकिन अब भाई के जाने से गम दोगुना हो गया है। बोले- इस नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।
संगीत की दुनिया में चमकने वाले रामपुर- सहसवान घराने में एक से बढ़कर हीरे मौजूद हैं। इन्हीं में उस्ताद सखावत हुसैन का नाम भी शामिल है जो स्व. उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां के पोते हैं। उस्ताद मुश्ताक हुसैन 1957 में पद्मभूषण प्राप्त करने वाले पहले भारतीय शास्त्रीय गायक थे। स्व. राशिद खां उस्ताद सखावत हुसैन के रिश्ते में चाचा लगते थे।
रामपुर से आए सखावत हुसैन खुद भी गजल गायक हैं और देश समेत विदेश में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। 2018 में बेगम अख्तर अवार्ड से सम्मानित सखावत ने कहा कि राशिद के इंतकाल से संगीत की दुनिया में जो खालीपन आया है उसे भरा नहीं जा सकता। बहुत कम उम्र में संगीत का नायाब हीरा चला गया।
ममेरे भाई नदीम भी संगीतज्ञ
राशिद खान के सबसे छोटे मामा उस्ताद आफताब अहमद खां के बेटे नदीम भी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में जाना पहचाना नाम बन गए हैं। नई पीढ़ी के गायकों में उनकी गिनती की जाती है जो शास्त्रीय संगीत को ऊंचाईयों पर ले जाने का काम कर रहे हैं। बचपन से ही अपने भाई राशिद खान के साथ मंच साझा करने वाले नदीम अमेरिका, रूस, वियतनाम, कंबोडिया में भी प्रस्तुति दे चुके हैं। उनके गुरु उनके सगे ताऊ उस्ताद गुलाम मुस्तफा खां रहे। दिल्ली से राशिद खान के जनाजे में शामिल होने आए नदीम बताते हैं कि बचपन में भाई राशिद खान उन्हें अपने साथ मंच पर लेकर जाते थे तो वह भी उनके साथ प्रस्तुति देते थे। राशिद खान संगीत की दुनिया के बेताज बादशाह थे।
रामपुर-सहसवान घराने के युवा गायक समीर खान नियाजी भी राशिद खान के निधन पर बेहद गमजदा थे। दिल्ली में रहने वाले समीर सूफी गजल गायक के रूप में पहचाने जाते हैं। दिल्ली रत्न अवार्ड, प्राइड ऑफ इंडिया, इंडो नेशनल अवार्ड समेत कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके समीर ने कई गाने लिखे और गाए हैं। राशिद खां के निधन पर बोले कि यह न केवल रामपुर-सहसवान घराने का बल्कि पूरे देश का नुकसान है। राशिद खान की आवाज में जो जादू था वह अब के गायकों की आवाज में होना नामुमकिन है। उनके निधन से संगीत के एक युग का अंत हो गया है।